मेरी अन्तर्वासना हिन्दी सेक्स स्टोरी की फ़ैन की चूत-4

अब तक आपने पढ़ा.. कविता की चूत और गांड एक साथ चोदने की तैयारी हो चुकी थी। अब आगे..

कविता बहुत जोर से सिसकारियाँ भर रही थी, आखिर दो मर्द उसके कामुक बदन को मसल रहे थे!

मैंने घूम कर कविता से 69 का स्टाइल कर लिया, अब मेरा लंड कविता के मुँह में था और कविता की चूत मेरे मुँह में थी।

नीचे से कविता की गांड के ऊपर और चूत के पास रोहित चूस रहा था और वो कविता की चूत के बीच भी जीभ डाल रहा था। मैंने कविता की चूत के अन्दर अपनी जीभ जैसे ही डाली तो हम दोनों मर्दों की जीभ कविता की चूत के अन्दर हो गई और कविता की धार बह निकली।

मैंने उसकी धार को पीना शुरू कर दिया, मैंने उसके दाने और चूत को खूब चूसा। वो सिस्कारियां लेकर झड़ती रही.. उसे आस-पास की कोई खबर नहीं थी, कविता का ये झड़ना बहुत कमाल का था, उसने मेरा लंड मुँह से निकाल दिया था बस वो अपनी चूत के झड़ने का ही मज़ा ले रही थी।

‘उई आह सी सी उई आह मरर गई.. बस बस उई आहह.. आह बहनचोद दी मेरी उम्म्ह… अहह… हय… याह… आह ई ई उई उओ सालों चुद गई आह आह उई…’ यह कहते हुए वो अपनी चूत से ऐसे रस छोड़ रही थी मानो पेशाब कर रही हो। इस बार कविता का रस बहुत ज्यादा निकल रहा था। बाद में मुझे रोहित ने बताया था कि कविता का रस ऐसे कभी कभी ही निकलता है.. जब उसे बहुत ज्यादा मज़ा आता है। यानि आज वो अपनी जवानी का भरपूर मज़ा ले रही थी।

कुछ देर बाद वो सामान्य हुई तो बोली- उफ्फ्फ.. आज बहुत मज़ा आया। मैंने कहा- अभी मज़ा आया कहाँ है, अभी तो आएगा। वो बोली- नहीं यार.. मैं थक चुकी हूँ, अब बस।

रोहित उससे बोला- साली, आज रवि जी यहाँ पर हैं और कल ये चले जाएंगे, ले ले मज़ा.. फिर इन्हें याद कर-करके चूत का पानी निकालती फिरोगी। वो कहने लगी- ठीक है पर मुझे कुछ वक्त तो दो। हमने कहा- ठीक है।

तब तक फिल्म भी ख़त्म हो चुकी थी, रोहित ने और दूसरी फिल्म लगा दी। कविता बाथरूम में चली गई। उसके बाद एक चक्कर उसने दूसरे रूम का लगाया और देखा कि बेटा सो रहा है। फिर वो गर्म-गर्म दूध सभी के लिए लेकर आई और बोली- पहले ये दूध पी लो।

हम नंगे ही बैठे थे.. नंगे ही दूध पी रहे थे। मैं कभी कविता की चूची को काट लेता.. कभी रोहित उसे टच करता.. कभी उसकी जांघ के पास थपथपा देता।

ऐसे ही हम अब तीनों खुल चुके थे तो कभी-कभी कविता भी मेरी छाती को थपथपा देती और कभी मेरे लंड को पकड़ कर कहती- तो ये है.

. जिसे मैं याद कर करके फ़ोन पर चुदा करती थी। हम सभी हँसने लगे।

दूध ख़त्म होते ही मैंने फिर से कविता को किस किया और उसे इस बार मैंने घोड़ी बनने को कहा। मैंने रोहित को बोला- अब आप कविता को चोदो और मैं देखता हूँ।

तभी कविता ने मेरी तरफ देखा पर बोली कुछ नहीं, जैसे वो आज मेरा पूरा फायदा उठाना चाहती थी.. मतलब मेरे से ही चुदना चाहती थी। रोहित ने अपना लंड पकड़ा और कुछ देर उसके पीछे रगड़ने के बाद अपना लौड़ा उसकी गांड के ऊपर रख दिया।

कविता एकदम से चिहुंक कर बोली- उई.. अरे क्या कर रहे हो? रोहित बोला- अरे कुछ नहीं तेरी गांड चोदने लगा हूँ डार्लिंग.. पहले भी तो तू अपनी गांड शौक से चुदवाती रही है?

कविता मेरे सामने जैसे शायद गांड मरवाना नहीं चाहती थी, परन्तु उसे नहीं मालूम था कि हमारी प्लानिंग कुछ और है। कविता बोली- अरे नहीं.. आगे ही करो आप।

मैंने कविता को बोला- देखो डार्लिंग, तुम गांड में ले लो.. कोई बात नहीं आगे मैं डाल देता हूँ। वो बोली- उई माँ.. आप दोनों एक साथ करोगे.. नहीं मैं मर जाऊँगी.. नहीं करो.. प्लीज़। मैंने कहा- अरे साली.. दो लंड लेकर तो देख.. तुझे जन्नत का मज़ा आ जाएगा.. अगर दिक्कत हुई तो हम निकाल लेंगे।

कविता सहमत हो गई और उसने अपनी गांड को पीछे करते हुए मुझे आगे आने का इशारा कर दिया। मैंने कहा- अभी नहीं.. अभी पहले आप इसकी गांड मारो।

रोहित उसकी गांड में झटके लगाने लगा। रोहित का आधा लंड उसकी गांड में जा चुका था। मैंने देखा कि अब थोड़ा सा लंड ही बाकी था, तो मैंने रोहित को वहीं रुकने का इशारा किया और मैं कविता के आगे आ गया।

मैंने पहले तो कविता के होंठों को अपने होंठों में लेकर थोड़ा चूसा और फिर किस करते हुए उससे कहा- डार्लिंग, अब अपना पूरा ध्यान देना और मेरा साथ देना।

उसने मुझे किस किया और सहमति का इशारा कर दिया। मैंने कविता के मम्मों को सहलाया और फिर अपना लंड पकड़ कर कविता की चूत पर रख दिया। कविता की गांड में पहले ही रोहित का लंड था था। अब उसको हम दोनों ने खड़ा कर लिया था। कविता की चूत के मुँह पर मैंने अपने लंड की टोपी रखी और मैंने थोड़ा सा झटका लगाकर अपने लंड को कविता की चूत में थोड़ा सा फंसा दिया ताकि वो झटका लगाने की वजह से इधर-उधर न खिसक जाए।

अब मैंने रोहित को झटका न लगाने के लिए कह कर.. कविता के दोनों हाथ अपने कंधे पर रखवा दिए और मैंने उसकी कमर पकड़ कर एक झटका लगाया तो मेरा थोड़ा सा लंड कविता की चूत में घुसता चला गया।

फिर मैंने लगातार 4-5 झटके लगाए और अपना लौड़ा कविता की चूत में जड़ तक उतार दिया। अब मैंने पीछे से रोहित को कविता की गांड में झटके लगाने का इशारा किया तो रोहित ने कविता की गांड में फिर से झटके शुरू कर दिए।

अब हम दोनों बराबर झटके लगा रहे थे, कभी एक साथ.
. कभी रुक-रुक कर.. अब कविता को भी बहुत मज़ा आ रहा था। कविता की गांड और चूत में एक साथ दो मर्दों के दो लौड़े घुसे थे। कविता तो जैसे जन्नत में थी और जोर-जोर से चिल्ला कर मज़ा ले रही थी।

कविता की चूत में जब मेरा लौड़ा जाता तो रोहित उसकी गांड से अपना लौड़ा थोड़ा बाहर निकाल देता और जब रोहित उसकी गांड में लंड डालता तो मैं अपना लौड़ा उसकी चूत से थोड़ा पीछे खींच लेता। कभी-कभी एक साथ दोनों लौड़े उसके अन्दर धकेल देते।

जब कविता के अन्दर हम दोनों के लौड़े एक साथ जाते तो कविता जोर से चिल्लाती।

ऐसे हम तीनों चुदाई का मज़ा ले रहे थे तो कविता गालियाँ निकालने लगी और मुझे उसने कस कर पकड़ लिया। मैंने रोहित को ऊपर से पकड़ लिया और रोहित ने कविता के ऊपर से अपनी बाजू निकाल कर मुझे पकड़ लिया। इस तरह हम तीनों गुत्थम-गुत्था हो गए और हम दोनों के लंड एकदम कविता की चूत और गांड के अन्दर हो गए।

कविता की गांड तो पहले भी रोहित ने बहुत चोदी थी, परन्तु आज उनका ये पहला तजुर्बा था.. सो इसमें मज़ा भी आ रहा था। कविता गालियाँ निकालते हुए अपनी जवानी का सबसे बेहतरीन मज़ा लेने लगी। यह हिन्दी सेक्स कहानी आप अन्तर्वासना सेक्स स्टोरीज डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं!

‘उई आह.. आह उई सी.. चूत चुद गई… फट गई गांड मेरे…चोदुओ.. मेरी चूत फाड़ दी कुत्तों.. आह उई बहनचोद दी तुमने मेरी.. आह आह मेरी गांड आज फट गई.. चूत कुतिया बना दिया आज तुम दोनों ने मुझे.. आह आह.. सालों फाड़ दिया.. मुझे आह उई.. उई आह आह फाड़ कर रख दी अपनी रांड.. आह आह उई…. कुत्तों, मादरचोदों.. उई गई गई.. उई..’

ऐसे सिसकती हुई कविता झड़ने के बहुत करीब थी। इधर हम दोनों का भी यही हाल था। रोहित भी सिसकने लगा और मैंने कविता के होंठों को अपने होंठों में लिया और उसके मम्मों को अपनी छातियों में दबा लिया। फिर उसके होंठ छोड़ कर बोला- आह उओइ ले.. साली.. कुतिया.. बहन की लौड़ी तेरी बहन की चूत को चोदूँ.. ले चुदवा अपनी माँ की चूत.. कुतिया.. सा..ली. मादर.चोद.. आ..ह. बहनचोद चुद गई तू.. आह उई ले साली चुदवा ले चूत… चुदवा ले गांड..’

उधर रोहित भी सिसक रहा था ‘उई आह आह.. कुतिया ले साली मादरचोद.. बहन की लौड़ी तू भी याद करती थी न रोज़.. रवि की चुदाई को.. ले आज फट गया तेरा सब कुछ.. रवि से चुद्वा ले चूत ले आज.. रवि की जवानी से कुतिया आह आह उई उह..रवि.. इसकी चूत भर देना अपने रस से आह.
. उई उई सी…सी..’

इस तरह हम सभी झड़ने के करीब थे। अब कविता तो झड़ने भी लगी थी, उसकी चूत से फिर से नदिया बहने लगी थी। रोहित के एक ही झटके से वो मेरे लंड को अपनी चूत में पकड़ कर रुक गई थी। जैसे उसने मेरे लंड को एक ही जगह पर अपनी चूत में टाईट कर लिया था तो मैं भी उसकी चूत में से लंड को आगे-पीछे करना बंद कर दिया क्योंकि अब हर झटका रोहित उसकी गांड में लगा रहा था.. जिससे मेरा लंड उसकी चूत में मज़े उतना ही हिल-डुल कर रहा था।

मैंने कविता के होंठों को अपने होंठों में ले लिया और उसके मुँह में कभी अपनी जीभ डाल देता.. कभी वो मेरे मुँह में अपनी जीभ डाल देती।

इस समय सबसे ज्यादा मज़ा कविता को आ रहा था, क्योंकि उसकी गांड और चूत दोनों जगह से मज़ा मिल रहा था। अब जोर से कविता की चूत ने धार छोड़ी और कविता का जिस्म कांपता हुआ थरथराता हुआ एक जगह पर रुक ही गया।

आपके ईमेल की प्रतीक्षा में आपका रवि [email protected] कहानी जारी है।

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