मार्च 2019 की बेस्ट लोकप्रिय कहानियाँ

प्रिय अन्तर्वासना पाठको मार्च 2019 प्रकाशित हिंदी सेक्स स्टोरीज में से पाठकों की पसंद की पांच बेस्ट सेक्स कहानियाँ आपके समक्ष प्रस्तुत हैं…

मेरी बारहवीं के एग्जाम खत्म हो गए थे, मम्मी और पापा दोनों जॉब करते थे, इसलिए मैं दोपहर को घर में अकेली ही रह जाती थी.

समीर अंकल, उनको मैं अंकल ही बुलाती थी. वो मेरे पापा के दोस्त के भाई हैं. उनका गांव यहां से बहुत दूर है, पर अभी हमारे ही शहर के एक कॉलेज में इंग्लिश के प्राध्यापक है.

हमारे बंगलो में एक गेस्ट क्वार्टर में उनके रहने की व्यवस्था की गई है. अब तो वे पापा के भी अच्छे दोस्त बन गए हैं. अंकल अकेले ही रहते थे, इसलिए उनके खाने की व्यवस्था भी हमारे ही यहां की थी.

उनके यहां पर रहने पर मम्मी को भी कोई ऐतराज नहीं था, क्योंकि उनका पढ़ाने का विषय इंग्लिश था. मैं इंग्लिश में थोड़ी कमजोर थी, तो मम्मी को लगा कि उनकी ट्यूशन का मुझे फायदा होगा. अंकल ने भी मुझे बहुत अच्छे से पढ़ाया, ट्यूशन में मेरे साथ मेरी दो सहेलियां सीमा और जया भी थीं और हम तीनों के पेपर्स अच्छे गए थे. मेरी तरह वो दोनों भी अंकल की पढ़ाई से बहुत खुश थीं.

मैंने दोपहर को सब काम खत्म करके थोड़ी देर आराम किया, फिर मैं दरवाजे को लॉक करके अंकल के क्वार्टर की तरफ गयी. दरवाजे पर खटखटाया, तो अंकल ने दरवाजा खोला. अंकल- आओ नीतू बेटी, मैं तुम्हारी ही राह देख रहा था.

अंकल लगभग चालीस बयालीस की उम्र के होंगे, पर अभी तक उनकी शादी नहीं हुई थी. वे बैचलर थे, फिर भी उन्होंने अपना रूम बिल्कुल साफसुथरा रखा था. उनके रूम में ज्यादा सामान भी नहीं था. एक कोने में एक लकड़ी का बेड था, उसके पास उनका स्टडी टेबल, उसके पास एक फ्रिज. एक दीवार के पास सोफासैट और उसके सामने वाली दीवार पर टीवी.

अंकल बोले- ऐसे क्या देख रही हो, कहीं कुछ सामान तो नहीं बिखरा पड़ा? मैंने कहा- कितनी साफ सुथरा है आपका रूम, मेरा रूम तो आपके रूम से गंदा होगा. अंकल क्या काम था?

अंकल ने मुझे बेड पर बिठाया और और स्टडी टेबल की कुर्सी खींच कर मेरे सामने बैठ गए और बोले- नीतू तुम्हें तो पता है कि मैं मैगज़ीन में और ब्लॉग पर आर्टिकल लिखता हूँ.

वैसे तो अंकल बहुत ही टैलेंटेड इंसान हैं, पढ़ाते भी अच्छा हैं, उतना अच्छा लिखते भी हैं. गाना भी अच्छा गाते हैं और स्पोर्ट्स में भी अच्छे हैं.

हर रोज जिम जाकर उन्होंने अच्छी खासी बॉडी भी बना ली है.

मैं- हां पता है, कल ही पापा घर में आप के किसी आर्टिकल की तारीफ कर रहे थे. वे बोले- उसी सिलसिले में मुझे तुम्हारी मदद चाहिए थी. अंकल जैसे टैलेंटेड इंसान को भला मैं किस तरह की मदद कर सकती थी? वे बोले- मुझे मेरे ब्लॉग पर एक आर्टिकल लिखना है, उसके लिए ही मुझे तुम्हारी मदद चाहिए. मैं- अंकल, आप जैसे एक्सपर्ट को मैं क्या मदद कर सकती हूं? वैसे आर्टिकल का विषय क्या है? अंकल बोले- अब तुम्हें कैसे बताऊं, तुम गुस्सा तो नहीं होगी ना?

अंकल खामखा सस्पेंस बढ़ा रहे थे. मैं बोली- मैं कभी आप पे गुस्सा हो सकती हूं क्या, आपने मेरी इतनी मदद की है. आप नहीं होते, तो मैं फेल ही हो जाती. आप बताओ न, क्या विषय है आर्टिकल का?

उनके चेहरे पर बोलूँ कि नहीं बोलूँ, कुछ ऐसे भाव थे. फिर हिम्मत करके वो बोले- तुम्हें अंग्रजी में ‘किस’ शब्द पता है? मैं थोड़ा डर गई, क्या बोलूँ मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. “पता है तुम्हें?” अंकल ने दूसरी बार पूछा तो मैंने सिर्फ सिर हिलाकर हां बोला. अंकल ने पूछा- फिर बताओ हिंदी में क्या कहते हैं? मैं बोली- उसे ‘चुम्मी..’ बोलते हैं.

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मैं आपकी अपनी अर्चना मैडम। उम्र 40, कद पाँच फीट 3 इंच, रंग गोरा, सीना 40 कमर 38 और हिप 42. मुझे पता है इतना पढ़ते ही आप लोगों ने तो मुझे अपने तसव्वुर में नंगी कर ही लिया होगा। मगर एक और बात बता दूँ; मेरे जो निप्पल हैं, वो हल्के भूरे हैं. बेशक मैं तीन बच्चों की माँ हूँ और तीनों बच्चों ने मेरा दूध 2 ढाई साल तक पिया है, मगर इतना चूसने के बाद भी मेरे निप्पल की डोडी बाहर को उभरी हुई नहीं है, निप्पल बस छोटे से दाने जैसे हैं, जैसे किसी ने खरबूजे पर आधा अंगूर काट कर रख दिया हो, समझ गए न।

और वैसे जब दो साल की प्यासी शादीशुदा औरत किसी गैर मर्द से अपनी प्यास बुझा ले, तो फिर तो न जाने क्यों ये प्यास बढ़ती ही जाती है। फिर तो ऐसे लगने लगता है कि हर पुरुष में सिर्फ उसकी मर्दानगी ही दिखती है चाहे रिश्ता कोई भी हो। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ जब मुझे मेरे पड़ोसी के बेटे ने पहली बार चोदा और मेरी बरसों की प्यास बुझाई; तो मैं तो उस पर दीवानी हो गई. उसके बाद तो वो हर शनिवार आता और मुझे डेढ़ दो घंटे तक लगतार और शानदार तरीके से चोद कर जाता। उसके साथ ही मैंने अपनी जिस्म की बरसों की प्यास बुझाई। उसने जैसे कहा, मैंने वैसा किया। पहले मैंने कभी गांड नहीं मरवाई थी, मगर उसने कहा तो मैंने उस से अपनी गांड भी मरवा ली और उसके बाद वो अक्सर मेरी गांड मारता।

लंड तो मैं चूसती ही थी, उसने एक दो बार मुझे अपना माल भी पिलाया, हालांकि मुझे वीर्य पीना पसंद नहीं है मगर फिर भी मैंने सिर्फ उसकी खुशी के लिए पी लिया। यक्क … चलो कोई बात नहीं, वो भी तो जब मेरी फुद्दी चाटता था तो मेरा पानी जो छूटता था, सब चाट जाता था।

उसके बाद मैं प्रेग्नेंट हुई। मुझे नहीं पता कि मेरे पेट में जो बच्चा था, वो मेरे पति का था, या उस लड़के का। खैर मेरी पहली बेटी हुई मगर फिर मेरा उस लड़के से अफेयर चलता रहा। छिले(प्रसव) के 2 महीने बाद हम फिर मिले। अपने पति से पहले मैं उससे मिली, अपने यार से; उसने खूब चोदा मुझे, दर्द भी हुआ, क्योंकि अभी मेरा बदन इस सब के लिए तैयार नहीं था। मगर फिर भी मैंने उसे इंकार नहीं किया।

मेरे दूध से भर मम्मों से वो बहुत खेला, खूब दूध निचोड़ा मेरा। अपने दूध से मैंने उसका लंड धोया। उसने खुद भी मेरा बहुत दूध पिया। उसके बाद तो गाड़ी चल सो चल … जब तक मेरी बेटी मेरा दूध पीती रही, वो भी मेरा दूध हर बार पीता, मज़े के लिए या वैसे ही, पर बिना मेरे मम्मों से दूध चूसे, उसने मुझे कभी नहीं चोदा। चलो जब बेटी थोड़ी बड़ी हो गई तो उसने मेरा दूध पीना छोड़ दिया और फिर कुछ समय बाद मेरे दूध आना भी बंद हो गया। इसी दौरान उस लड़के को जॉब मिल गई और वो अमेरिका चला गया, जहां जाकर उसने शादी भी कर ली। मैं फिर से अपने पति तक सीमित रह गई।

मगर मैं अब कहाँ टिकने वाली थी। शेरनी के मुंह को खून लग चुका था तो मैंने अब कोई और तलाश करना शुरू कर दिया। इसी दौरान मुझे एक हमारे कॉलेज के प्रोफेसर मिले। बेशक उनका नाम तो कुछ और है, मगर मैंने वैसे ही इस कहानी में उनका नाम प्यारेलाल रखा है क्योंकि वो मुझे प्यार बहुत करते हैं.
पर प्यार के दौरान मार मार कर लाल कर देते हैं इसलिए प्यारे और लाल मिल कर बने प्यारेलाल।

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मेरा नाम कृति है, और मैं अभी सिर्फ 18 साल की हूँ। वैसे तो अक्सर फिल्मों में गीतों में आप सबने सुना देखा होगा, मैंने भी सुना और देखा था कि लड़की 18 की हो गई, उस पर बहुत जवानी आ गई, आग का गोला हो गई। फिल्मों में तो 35 साल की औरत को 18 की बता देते हैं, मगर मैं जिस दिन 18 साल की हुई मुझे ऐसा कोई बदलाव मुझ में नज़र नहीं आया। मैं सोच रही थी कि ऐसा क्या हो गया आज, जो कल नहीं था।

यह बात मैंने अपनी एक क्लासमेट से करी तो वो बोली- अरे शीशे में देखना खुद को, पता चल जाएगा। वो थोड़ी भरी हुई कद काठी वाली थी। हमारी क्लास में सबसे जवान वो ही लगती थी, बड़े बड़े मम्मे, मोटी मोटी जांघें, और ये बड़े बड़े चूतड़। पहली बार मैं उसी के मुँह से सुन था के चूतड़ों को गांड भी कहते हैं क्योंकि मैं तो हमेशा बैक या हिप्स ही कहती थी, चूतड़ तो मुझे बोलने में भी शर्म आती थी। उसका ज्ञान हमारी क्लास में सबसे ज़्यादा था, इसीलिए हम सभी उस से ही सेक्स की बातें पूछते होते थे। जब भी फ्री पीरियड होता, तो वो अक्सर हम लड़कियों को सेक्स के बारे में अपना ज्ञान बांटती। क्लास की सभी लकड़ियाँ तो उसकी दोस्त नहीं थी, बहुत सी तो उसे अच्छा भी नहीं मानती थी। मगर हम जिन लड़कियों की वो दोस्त थी, उनसे वो बहुत खुल कर बात करती थी।

एक बार तो क्लास में उसने पहली बार हम लड़कियों को अपनी उसमें (चूत में) उंगली डाल कर दिखाई। मैं तो देख कर हैरान हो गई, उसके हाथ की बीच वाली बड़ी उंगली, वो डालती गई और सारी उंगली अंदर चली गई। उसने हमसे भी ऐसे ही करने को कहा। मगर मैं नहीं कर सकी, मैंने मना किया, मगर कुछ और लड़कियों ने ट्राई किया और उनकी उंगली भी अंदर चली थी। कुछ ने कहा कि दर्द होता है, मगर कुछ को कोई दर्द या कुछ अलग सा नहीं लगा. मुझे दोनों से ज़्यादा, ये सब करना अजीब लग रहा था, इसलिए मैंने नहीं किया।

उसने ही जब मुझे मेरे अठारहवें जन्मदिन के बाद खुद को शीशे में देखने को कहा था, तो मैंने घर आकर खुद को शीशे में देखा, मुझे तो कुछ भी फर्क नहीं लगा। बिल्कुल कल जैसी ही तो थी मैं। मैं अक्सर खुद को शीशे में देखती और मुझे कोई फर्क नहीं दिखता।

फिर मैंने उस से बात की कि मुझे तो कोई फर्क नहीं लगा। वो बोली- कैसे देखा था खुद को शीशे में? मैंने कहा- जैसे मैं अब हूँ। वो बोली- अरे पागल, ऐसे नहीं, कपड़े उतार कर खुद को शीशे में देखना। अपने सारे जिस्म को, अपने मम्मे देख, बड़े हुये कि नहीं, अपनी चूत देख, इस पर झांट और घनी हुई या नहीं। अपनी गांड देख, और भारी हुई या नहीं। मैंने कहा- अब यार, तेरे जैसी तो नहीं हो सकती मैं। वो बोली- मेरे जैसे न सही, अपने जिस्म में होने वाले चेंजेज़ को नोटिस कर। हम मेडिकल के स्टूडेंट है, आगे हमें ये सब दिखाया जाएगा, सिखाया जाएगा। मेरे भैया भी डॉक्टर हैं, उनकी बुक्स मैंने देखी, उनमें तो मैंने बहुत सी मर्द औरतों की नंगी डायाग्राम देखी, बहुत सी पिक्स भी थी।

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बात तब की है जब मैं 18 को पार कर चुका था और 11वीं क्लास में पढ़ता था, गाँव में देर से पढाई शुरू होती है तो इतनी उम्र हो जाती है.
गाजियाबाद के पास हमारा गाँव है, वहीं पर हमारा पुश्तैनी घर है और बाकी का सारा खानदान रहता था।

अब यू पी का लड़का हूँ, तो खून में गर्मी कुछ ज़्यादा ही है। तो 11वीं क्लास में ही लुल्ली उठने लगी थी, बड़ा मन करता था कि कोई गर्लफ्रेंड हो, तो साली को जम कर पेलूँ, मगर स्कूल में जो लड़कियां थी, उनसे तो बात नहीं बन पा रही थी। बड़ा मन भटकता, कभी कभी मुट्ठ भी मार लेता. मगर दिल तो फुद्दी मारने को करता था, मुट्ठ से कहाँ मन को चैन मिल सकता था। चलो इसी उम्मीद में ज़िंदगी निकल रही थी कि सब्र करो एक न एक दिन तो ज़रूर कोई फुद्दी मिलेगी, जिसे मैं खूब जम कर मरूँगा।

किस्मत ने मुझ पर मेहरबानी की। गर्मियों की छुट्टियाँ हुई तो मैं और मेरी छोटी बहन, मम्मी पापा के साथ हम सब अपने गाँव गए। हालांकि हमारा गाँव कोई हिल स्टेशन तो नहीं था, मगर बचपन में हमें गाँव जाने का बहुत चाव था क्योंकि वहाँ सारा दिन आवारागर्दी करनी, कभी खेत में, कभी ट्यूबवेल पर, कभी ताल पर, कभी बाग में … बस यूं ही घूमते रहना, कभी गर्मी नहीं लगती थी, कभी बोर नहीं होते थे।

मेरे दो चाचा हैं, उनके बच्चे हमारी ही उम्र के हैं, तो उनसे हमारी खूब पटती थी। हम चारों भाई बहनों ने खूब मस्ती करनी। इस बार भी हमने खूब मस्ती करने की सोची थी। जब गाँव पहुंचे तो जब मैंने अपनी चाचा की लड़की को देखा, तो एक बार तो मैं भी अचंभित सा हुआ। उसकी कमीज़ सीने से काफी उठी हुई थी। “अरे यार!” मैंने सोचा- ये तो साली जवान हो गई, बड़ा मम्मा फूला है साली का।

बस दिमाग में ये बात आई और वो जो कुछ पल पहले मेरी बहन थी, अब मुझे वो एक सेक्सी लड़की दिख रही थी। खैर मैंने अपने मन में उठ रहे जवानी की हिलौरें मन में ही संभाली और चुपचाप वक्त का इंतज़ार करने लगा, जब मुझे कोई मौका मिलता और मैं उसकी चढ़ती जवानी को देख सकता, छू सकता या भोग सकता, हालांकि इसकी ऐसी कोई संभावना तो नहीं थी, पर उम्मीद पर दुनिया कायम है, सो मैं भी उम्मीद की कतार में लग गया।

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यह कहानी मेरी पहली चुदाई की है जिसमें मेरी सील टूटी। उम्मीद करती हूँ कि आप लोगों को पसंद आएगी।

सबसे पहले मैं आप सबको अपने बारे में थोड़ा सा बता देती हूँ। मेरा नाम सुहानी चौधरी है। जैसा मेरा नाम है वैसे ही मेरा शरीर। मेरा ठीक ठाक हाइट की हैं और तन का रंग भी गोरा है। मैं थोड़ी सी भरी भरी शरीर की हूँ पर मोटी नहीं हूँ। मेरी शक्ल काफी मासूम सी है और स्वभाव भी शर्मीला सा ही है।

शुरू से ही मैं पढ़ाई मैं ज्यादा ध्यान देती थी, हालांकि मेरी दोस्ती लड़कों से बहुत कम थी फिर भी मैं सभी से बोल लेती थी। बहुत से लड़कों ने मुझको प्रपोज़ किया पर मैं सबको प्यार से मना कर देती थी। जब मैंने कॉलेज में एड्मिशन लिया उस साल से मेरी मासूमियत का वक़्त पूरा होने लगा। मेरी दोस्ती एक लड़की से हुई जिसका नाम तन्वी है.
शुरू में लगा कि वो भी मेरी तरह शरीफ है पर जब तक मैं उसे समझ पाती, मैं सेक्स के समुंदर में उतार चुकी थी। और मुझे बिगाड़ने का पूरा श्रेय मेरी सहेली तन्वी को जाता है।

हम दोनों एक ही हॉस्टल रूम में रहती थी। शुरू के एक महीने तो सब नॉर्मल चला फिर मुझे उसकी बातें पता चलने लगी। क्लास के बहुत से लड़कों ने उससे मेरे से सेटिंग कराने को बोला क्यूंकि मैं लड़कों से ज्यादा बात नहीं करती थी। पर मैंने सबको मना कर दिया।

एक दिन रात को मेरी आँख खुली तो देखा कि तन्वी कम्प्यूटर पर ब्लू फिल्म देख रही थी और अपनी चूत रगड़ रही थी। मैंने सोचा इसे डराती हूँ और मैं उठ के चिल्लाने लगी- क्या है ये सब? पर वो ज्यादा तेज़ थी, बोली- चिल्ला क्यूँ रही है तू भी देख ले। अब बच्चों की आदतें छोड़ और बड़ों जैसी हरकतें किया कर। उसकी बात सही थी तो मैं भी साथ में ब्लू फिल्म देखने लगी। मैंने पहली बार देखी थी तो कुछ अजीब भी लग रही थी और अच्छी भी।

मुझे पता भी नहीं चला और मैं अपनी चूत को ऊपर से रगड़ रही थी। तन्वी ये देख के मुस्कुराने लगी, फिर वो बोली- शर्मा मत, उतार दे लोअर और फिर रगड़। मैं शरमा रही थी तो उसने अपने सारे कपड़े उतार दिये. थोड़ा शर्माते हुये मैं भी उसके सामने नंगी हो गयी। फिर मैं फिल्म देखते हुये रगड़ने लगी अपनी चूत को।

5 मिनट के बाद मुझे बहुत अजीब सी गुदगुदी सी होने लगी और शरीर में कम्पकपी से होने लगी। फिर एकदम से काँपते हुए मेरा पानी छूट गया और मैं हाँफने लगी। मैं हंस रही थी और तन्वी फिर बोली- कैसा लगा सुहानी? मैंने कहा- यार, मजा आ गया … ऐसा मजा तो पहले कभी नहीं आया।

उसने पूछा- इससे ज्यादा मजा चाहिये? मैं बोली- कैसे? तो वो बोली- मैं तेरे लिए लंड का इंतजाम कर सकती हूँ। मैं डर गयी और बोली- नहीं यार … वो सब शादी के बाद करना सही होता है। पहले करो तो सब कैरक्टर लेस समझते हैं। उसने कहा- जब तक कोई पकड़ा ना जाए, कोई कुछ नहीं कहता।

उसकी बात सही थी तो मैं बोली- किसी को पता तो नहीं चलेगा न? उसने मुझे भरोसा दिलाया कि नहीं पता चलेगा।

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