दो नम्बर का बदमाश-3

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दोस्तों अब दिल्ली लुटने को तैयार थी…

मैंने उसका टॉप उतार दिया। दोनों क़बूतर आज़ाद हो गए। वो आँखें बन्द करके लेटी थी। होंठ काँप रहे थे। मैंने अभी तक उसकी चूत को हाथ भी नहीं लगाया था। आप तो जानते हैं मैं प्रेम गुरु हूँ और जल्दीबाज़ी में विश्वास नहीं रखता हूँ। मैं तो उसके मुँह से कहलवाना चाहता था कि ‘मुझे चोदो’। अब मैंने उसके होठों पर उसके होंठ रख दिए। उसके नरम नाज़ुक रसीले होठ नहीं जैसे शहद से भरी फूलों की पँखुड़ियाँ हों। मैंने उसे गालों पर, पलकों पर, माथे पर, गले पर, कान पर, दोनों उरोजों पर, और नाभी पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी।

वो आआहहह… उहहहह… करती जा रही थी। अपने पैर पटक रही थी। उसकी सीत्कार तेज़ होती जा रही थी। वो बोली “ये मुझे क्या होता जा रहा है…” वो रोमांच से काँप रही थी। मैं जानता था अब वह झड़ने वाली है। अरे वो तो बिल्कुल कच्ची कली ही निकली। उसका शरीर अकड़ा और उसने मेरे होंठ ही काट लिए। उसके नाखून मेरी पीठ पर चुभ रहे थे। उसने एक हल्की सी सिसकारी मारी। लगता है उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। फिर वह ठंडी पड़ गई।

मैंने अपने कपड़े उतार दिए। सिर्फ चड्डी पहनी रखी। पप्पू महाराज ने अपना सिर चिपकी हुई चड्डी से भी बाहर निकाल ही लिया। उस बेचारे के क्या दोष था। अब निशा की बेल-बॉटम हटाने का वक्त आ गया था। निशा आँखें बन्द किए लेटी थी। मैंने उसकी सैलेक्स (सूती के पाजामे जैसी) के इलास्टिक को धीरे-धीरे नीचे करना शुरु किया। (उसने फिर बत्ती बन्द करने को कहा, तो मैंने कहा कि वो जंगली बिल्ली आ गई तो तुम्हारा दूध पी जाएगी और मैं भूखा ही रह जाऊँगा, रहने दो।)

निशा ने अपने चूतड़ थोड़े से ऊपर कर दिए। प्यारे पाठकों, और पाठिकाओं ! अब तो स्वर्ग का द्वार बस एक दो इंच ही रह गया था। चूत का अनावरण होने ही वाला था। मेरा पप्पू तो ठुमके पर ठुमका लगा रहा था। उसने तीन-चार वीर्य की पहली बूँदें छोड़ ही दीं। वो तो इस स्वर्ग के द्वार के दर्शन के लिए कब से बेताब़ था।

पहले छोटे-छोटे रेशमी बाल (उन्हें झाँट तो कतई नहीं कहा जा सकता) नज़र आए, और फिर किशमिश का दाना और फिर दो भागों में बँटी हुई उसकी नाज़ुक सी मक्खन मलाई सी चूत की फाँकें। गुलाबी रंगत लिए हुए। चूत के दोनों होठों पर हल्के-हल्के बाल। बीच में हल्की चॉकलेटी रंग की मोटी सी दरार। चीरे की लम्बाई ३ इंच से ज़्यादा बिल्कुल नहीं थी। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, ऊपर और नीचे के होंठों में रत्ती फर भी फ़र्क नहीं था। मोटे-मोटे गुलाबी रंग के संतरे की फाँके हों जैसे। दाईं जाँघ पर वो काला तिल। जैसे मेरे कत्ल का पूरा इन्तज़ाम किए हो। उसकी चूत काम-रस से सराबोर नीम गीली थी।

मैंने अपने हाथों की दोनों उँगलियों से उसकी चूत की दोनों पंखुड़ियों को धीरे से चौड़ा किया। एक हल्की सी ‘पट’ की आवाज़ के साथ एक गहरा सा चीरा खुल गया।

उफ्फ.. सुर्ख लाल पकौड़े जैसी चूत एक दम गुलाबी रंग की थी। ऊपर अनार दाना, उसके नीचे मूत्र-छिद्र माचिस की तीली की नोक जितना बड़ा। आईला… और उसका फिंच… स्स्स्सी… का सिस्कारा तो कमाल का होगा। एक बार मूतते हुए ज़रूर चुम्मा लूँगा. मूत्र-छिद्र के ठीक एक इंच नीचे स्वर्ग-गुफ़ा का छोदा सा बन्द द्वार जिसमें से हल्का-हल्का सा सफेद पानी झर रहा था।

मैंने अपनी जीभ जैसी ही उसकी मदन-मणि के दाने पर रखी तो उसकी एक सीत्कार निकल गई। मैंने जीभ को उसके मूत्र-छिद्र पर फिराया और फिर उसके स्वर्ग-द्वार पर। कच्चे नारियल, पेशाब और पसीने जैसी मादक सुगन्ध मेरे नथुनों में भर गई। कुछ मीठा, खट्टा, नमकीन सा स्वाद भला मैं कैसे नहीं पहचानता, जैसे मिक्की ही मेरे सामने लेटी हो।

निशा तो अब किलकारियाँ मारने लगी थी। उसने अपने नितम्ब ऊपर-नीचे उठाते हुए अपनी चूत मेरे मुँह से चिपका दीं। मेरे सिर को दोनों हाथों से ज़ोर से पकड़ लिया और ज़ोर से बाल नोच लिए। इसमें उस बेचारी का क्या दोष। मुझे लगा अगर यही हालत रही तो मैं जल्दी ही गंजा हो जाऊँगा। पर अगर ऐसी चूत के लिए गंजा भी होना पड़े तो कोई ग़म नहीं।

उसने उत्तेजना में अपने पाँव ऊपर उठा लिए और मेरे गले के गिर्द लिपट दिए ज़ोर से। मैंने उसकी पूरी की पूरी चूत को अपने मुँह में भर लिया था, वह थी भी कितनी, एक छोटे परवल या सिंघाड़े जितनी ही तो थी। मैंने उसे ज़ोर से चूसा तो निशा ने इतनी ज़ोर की किलकारी मारी कि अगर बाहर तेज़ बारिश और बिजली नही कड़क रही होती तो पड़ोस वाले अवश्य ही सुन लेते। उसके साथ ही उसकी चूत ने कोई ३-४ चम्मच शहद जैसे मीठे नमकीन खट्टे नारियल पानी और पेशाब की मिली-जुली सुगन्ध जैसे काम-रस छोड़ दिया जिससे मेरा मुँह लबालब भर गया। सही मायने में निशा का यह पहला स्खलन था। मैं तो उसे चटकारे लेकर पी ही गया।

दोस्तों, २ उत्पादों की लाँचिंग सफलतापूर्वक हो गई थी। अब चूत और गाँड की चुदाई तथा लंड चुसवाना बाकी था। सबसे पहले चूत की बारी थी, फिर लंड-चुसाई और अन्त में गाँड। आईये अब चूत-रानी का उदघाटन करते हैं। आप तैयार है ना। मेरा पप्पू तो मुझे आज ज़िन्दा नहीं छोड़ेगा। बहुत तड़पाया है इस चूत ने उसे। पूरे २ घंटे से एकदम सावधान की स्थिति में सलामी मार रहा है।

निशा बेसुध सी आँखें बन्द किए लेटी थी। थोड़ी देर बाद उसने अपनी जाँघों की कैंची ढीली की और मेरा सिर पकड़ कर ऊपर की ओर सरकाया और अपने होंठ मेरे होंठों पर रखकर चूसने लगी। २-३ मिनट चूसने के बाद वो बोली “जीजू मुझे पता नहीं ये क्या होता जा रहा है। एक मदहोशी सी छा रही है। कुछ करो ना… उफ्फ… हाय्य्य्यययय…” एक ज़ोर की सीत्कार उसने ली। लगता था वो एक बार फिर झड़ गई है।

मैं उसके ऊपर आ गया। मैंने अपनी चड्डी फाड़ फेंकी। मेरा ७” का पप्पू आज तो लोहे की तरह सख़्त था। उसकी लम्बाई आधा इंच बढ़कर ७.५ इंच हो गई थी। मैंने कहा “क्या करूँ मेरी जान?”

“ओह… जीजू… अब मत तरसाओ… कर लो अपने मन की। ओह आप मेरे मुँह से क्या सुनना चाहते हैं। मुझे शर्म आती है। प्लीज़…” कुछ ना कहते हुए भी उसने सबकुछ कह दिया था। मैंने अपने लंड को उसकी चूत पर लगा दिया।

“ऊईईईई… माँआआ.. ओहहहह… जीजू वो… वो… निरोध (कॉण्डोम) तो लगा लो” निशा की आवाज़ काँप रही थी।

“मेरी रानी निरोध से मज़ा नहीं आएगा।”

“पर वो… वो… अगर मैं गर्भवती हो गई तो…?”

“मेरी जान फिर तुम्हारा नया उत्पाद किस दिन काम आएगा? सिर्फ एक महीने में एक गोली?” मैंने कहा, और मन में सोचा ‘साली मुझे पपलू समझती है।’

“ओह… जीजू, तुम भी एक नम्बर के बदमाश हो…” और उसने मुझे कससकर अपनी बाँहों में भर लिया।

“नहीं, मैं तो २ नम्बर का बदमाश हूँ।” मैंने कहा।

“क्या मतलब?”

“वो बाद में अभी तो एक नम्बर का ही मज़ा लो।” और मैंने तकिये के नीचे से वैसलीन की डिब्बी से थोड़ी से वैसलीन निकाली और अपने लंड और निशा की चूत में एक उँगली भर कर गच्च से डाल दी। उसकी हल्की सी चीख निकल गई। मैंने ५-७ बार उँगली अन्दर-बाहर की। हे भगवान, साली की क्या मस्त सँकरी चूत है। एकदम कच्ची कली जैसी, फ़कत कुँवारी, कोरी रसमलाई जैसी। अब देर करना ठीक नहीं था।

मैंने अपने पप्पू को उसकी चूत के मुहाने पर रका और उसकी कमर के नीचे एक हाथ डाला। उसके होंठों को अपने मुँह में भर लिया और फिर एक ही झटके में ३ इंच लंड अन्दर ठोंक दिया। निशा की घुटी-घुटी चीख निकल गई। मैं तो प्रेम-गुरु था। मुझे पता था वो ज़रूर चीखेगी, इसीलिए मैंने उसके होंठों को अपने मुँह में ले रखा था। और उसकी कमर पकड़ रखी थी ताकि वो उछल कर मेरा काम ख़राब ना कर दे।

अभी धक्के मारने का समय नहीं हुआ था। कोई २-३ मिनट के बाद जब उसकी चूत कुछ आराम में आई और उसने पानी छोड़ा तब मैंने हौले-हौले धक्के लगाने शुरु किए पर अभी लंड पूरा नहीं घुसाया। मुझे पता था, अभी एक बाधा और बाक़ी है – उसकी झिल्ली उसकी सील उसकी नाज़ुक झिल्ली, उसकी कुँवारीच्छद। जिसके फटने का दर्द वो मुश्किल से सहन कर पाएगी। पर उसे भी तोड़ना था। मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फेरना चालू रखा। उसकी गाँड के छेद से जैसे ही मेरी उँगलियाँ टकराईं तो मैं तो रोमांच से भर उठा. बालों की कंघी के दाँत जैसी गाँड की तीख़ी नोकदार सिलवटों वाला छेद। आहहहह… क्या मस्त क़यामत है साली की गाँड की छेद

आप चौंक गए ना। आपने रोमांटिक कहानियों में ज़रूर सुना होगा कि लड़कियों की गाँड की छेद मुलायम होती है। अगर कोई ऐसा कहता है तो या तो वह झूठ बोल रहा है या फिर वो गाँड ज़रूर १५-२० बार लंड खा चुकी है। गुरुजी कहते हैं कि कुँवारी गाँड की पहचान तो उसके उभरे हुए सिलवटों से होती है। अगर आप इस लज्जत को महसूस करना चाहते हैं तो एक संतरे की फाँक लेकर उसकी पतली सफ़ेद झिल्ली को हटा दें। अब उसके जोये नज़र आएँगे। अपनी आँखें बन्द करके उन पर अपनी ऊँगली फिराएँ आप उसका नाज़ुकपन महसूस कर सकेंगे।

हे भगवान जिस लड़की ने अपनी चूत में भी कभी उँगली ना की हो उसकी अनछुई कोरी गाँड मार कर तो अगर इस दुनिया से जाना भी पड़े तो ये सौदा कतई घाटे वाला नहीं है। आज तो इस गाँड के छेद में अपना रस भर कर स्वर्ग के इस दूसरे दरवाज़े का लुत्फ हर क़ीमत पर उठाना ही है। पर अभी तो चूत की चुदाई चल रही है। गाँड की बात बाद में। पप्पू तो इस ख़्याल से ही अड़ियल टट्टू बन गया है। पता नहीं ये सब्र करना कब सीखेगा। उसने दो-तीन ठुमके चूत के अन्दर लगाए तो निशा की चूत ने भी उसे कस कर अन्दर भींच लिया।

मैंने उसके नितम्बों के नीचे एक तकिया और लगा दिया और अपना एक हाथ उसकी पतली कमर के नीचे डाल कर पकड़ लिया। अपने होंठ उसके होंठों पर रख करक उन्हें चूमा और फिर दोनों होंठ अपने मुँह में भर लिए। वो तो पूरी गरम और मस्त हो चुकी थी। उसने तो अब नीचे से हल्के-हल्के धक्के भी लगाने शुरु कर दिए थे।

मैंने अपना लंड थोड़ा सा बाहर निकाला और एक ज़ोरदार धक्का लगा दिया। धक्का इतना ज़बर्दस्त था कि उसकी सील को तोड़ता हुआ गच्च से जड़ तक उसकी चूत में समा गया। निशा की घुटी-घुटी चीख़ बाहर कड़कड़ाती बिजली की आवाज़ में दब गई। वो दर्द के मारे छटपटाने लगी। उसने मेरी पीठ पर अपने नाखून इतने ज़ोर से गड़ाए कि मेरी पीठ पर भी ख़ून छलक आया। उसकी चूत से ख़ून का फव्वारा छूटा और मेरे लंड को भिंगोता हुआ तकिए पर गिरने लगा।

निशा की कसमसाहट से उसके होंठ मेरे मुँह से निकलते ही वो ज़ोर से चीख़ी “ओईईईईई… माँ… मर… गईईईईईईईई…” और उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे।

मैंने उससे कहा “बस मेरी रानी अब दर्द खत्म ! अब तो बस आनन्द ही आनन्द है। बस अब चुप करो” मैंने उसके नमकीन स्वाद वाले आँसूओं पर अपनी जीभ रख दी। “जीजू आप भी एक नम्बर के कसाई हो, मुझे मार ही डाला… ओओईईईईई… निकाल बाहर.. मैं मर जाऊँगी… उईईईईई माँआआआआ….” वो रोए जा रही थी। मैं जानता ता ये दर्द ३-४ मिनट का है बाद में तो बस मज़े ही मज़े। मेरा पप्पू तो जैसे निहाल ही हो गया। इतनी कसी हुई चूत तो मधु की भी नहीं लगी थी, सुहागरात में।

कोई ५ मिनट के बाद निशा कुछ संयत हुई। उसकी चूत ने भी फिर से रस छोड़ना चालू कर दिया। मैंने उसकी कपोलों, होंठों और माथे पर चुम्बन लेने शुरु कर दिए। फिर मैंने उससे पूछा “क्यों मेरी मैना, अब दर्द कैसा है?” तो वह बोली “जीजू आपने तो मेरी जान ही निकाल दी, कोई कुँवारी लड़की को ऐसे चोदता है?”

“देखो अब जो होना था हो गया हा, अब तो बस इसके आगे स्वर्ग का सा आनन्द ही आनन्द है” और मैंने हौले-हौले धक्के लगाने शुरु कर दिए। निशा को भी अब थोड़ा मज़ा आने लगा था। मैंने कहा “मेरी मैना, अब तुम कली से फूल बन गई हो और मैं तुम्हारा मिट्ठू”

निशा की हँसी निकल पड़ी और उसने २-३ मुक्के मेरी पीठ पर लगाते हुए कहा “तुम पूरे एक नम्बर के बदमाश हो। अपने शब्द जाल में फँसा कर आख़िर मुझे ख़राब कर ही दिया।” मैंने एक धक्का और लगाया तो वह चिहुँकी “ओईईई… आआहह… या… ओह अब रूको मत ऐसे ही धक्के लगाओ… आहहह… या.. ओई… मैं तो गईईईईईईई….” और उसके साथ ही वो एक बार फिर झड़ गई। मैं तो जैसे स्वर्ग में था। मैंने लगातार ८-१० धक्के और लगा दिए। अब तो उसकी चूत से फच्च-फच्च का मधुर संगीत बजने लगा था।

ये सिलसिला कोई २० मिनट तो ज़रूर चला होगा। मेरा पप्पू बेचारा कब तक लड़ता। आख़िर उसको भी शहीद होना ही था। मैंने दनादन ५-७ धक्के और लगा दिए। निशा भी फिर से झड़ने के कगार पर ही तो थी। और फिर… एक.. दो… तीन चार… पाँछ.. पता नहीं कितनी पिचकारियाँ मेरे पप्पू ने छोड़ दीं… निशा ने मुझे कस कर पकड़ लिया और उसकी चूत ने भी काम-रज छोड़ दिया। उसकी बाँहों में लिपटा मैं कोई १० मिनट उसके ऊपर ही पड़ा रहा।

१० मिनट के बाद निशा जैसे नींद से जागी। मैं उठ कर बैठ गया। निशा भी मेरी ओर सरक आई। उसने मेरे होंठों पर दो-तीन चुम्बन ले लिए। मैंने उस से थैंक यू कहा तो उसने कहा “गन्दे बच्चे मेरे प्यारे मिट्ठू…” और मेरी नाक पकड़ कर ज़ोर से दबा दी। मेरे तीसरे उत्पाद की लाँचिंग की ये बधाई ही तो थी।

मैं उसे गोद में उठा कर बाथरूम की ओर ले जाने लगा। उसने अपनी बाँहें मेरे गले में डाल दी और आँखें बन्द कर लीं। मैंने देखा पूरा तकिया मेरे वीर्य, निशा के ख़ून, और काम-रज़ से भीगा हुआ था। मैंने एक हाथ से उस तकिए को उल्टा कर दिया ताकि निशा इतना ख़ून देखकर डर ना जाए।

निशा पॉट पर बैठकर पेशाब करने लगी। आहहहह… फिच्च… स्स्स्सीईईई… का वो सिसकारा और मूत की पतली धार तो मिक्की जैसी ही थी। मैं तो मन्त्र-मुग्ध सा बस उस नज़ारे को देखता ही रह गया। पॉट पर बैठी निशा की चूत ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने मोटे शब्दों में अंग्रेज़ी में ‘W’ (डब्ल्यू) लिख दिया हो। उसकी चूत ऐसी लग रही थी जैसे एक छोटा करेला किसी ने छील कर बीच में से चीर दिया हो। चूत के होंठ सूजकर पकौड़े जैसे हो गए थे। बिल्कुल लाल गुलाबी। उसकी गाँड का भूरा और कत्थई रंग का छोटा सा छेद खुल और बन्द हो रहा था। मुझे अपने चौथे उत्पाद की याद आ गई… अरे भाई लंड भी तो चुसवाना था ना।

मैंने उससे कहा “एक मिनट रूको, मूतना बन्द करो और उठो… प्लीज़ जल्दी”

“क्या हुआ?” निशा ने मूतना बन्द कर दिया और घबरा कर बीच में ही खड़ी हो गई। मैंने उसे अपनी ओर खींचा। मैं घुटनों के बल बैठ गया और उसकी चूत को दोनों हाथों से खोल करक उसकी मदन-मणि के दाने को चूसने लगा। वो तो आहहह… उहह्हह करती ही रह गई। उसने कहा “ओह… क्या कर रहे हो जीजू ओफ्फ्फ.. इसे साफ तो करने दो। ओह गन्दे बच्चे ओईईईई.. माँ…”

यही तो मैं चाहता था। मैं जानबूझ कर उसकी वीर्य और काम-रज से भरी चूत को चूस कर ये दिखाना चाहता था कि चुदाई में कुछ भी गन्दा नहीं होता, ताकि वह मेरा लण्ड चूसने में कोई कोताही ना बरते और कोई आनाकानी ना करे। “अरे प्यार में कुछ गन्दा नहीं होता” मैंने कहा। और फिर उसके किशमिश के दाने को चूसने लगा।

निशा कितनी देर तक बर्दाश्त करती। उसकी चूत के मूत्र-छिद्र से हल्की सी पेशाब की धार फिर चालू हो गई जो मेरी ठोड़ी से होती हुई गले के नीचे गिर सीने से होती मेरे प्पू और आँडों को जैसे धोती जा रही थी। उसने मेरे सिर के बाल पकड़ लिए कसकर। मैं तो मस्त हो गया। जब उसका पेशाब बन्द हुआ तो उसने नीचे झुक कर मेरे होंठ चूम लिए और अपने होठों पर जीभ फिराने लगी। उसे भी अपनी मूत का थोड़ा सा नमकीन स्वाद ज़रूर मिल ही गया।

हमने हल्का सा शॉवर लिया और साफ़-सफाई के बाद फिर बिस्तर पर आ गए। मैं बिस्तर पर टेक लगा कर बैठ गया। निशा अचानक उछली और मुझे एक तरफ लुढ़काते हुए मेरे पेट पर बैठ गई। उसकी दोनों टाँगें मेरे पेट के दोनों तरफ थी और उसके घुटने मुड़े हुए थे। उसने अपने होंठ मेरे होठों पर रख कर दो-तीन चुम्बन तड़ातड़ ले लिए। उसके सिन्दूरी आम मेरे सीने से लगे थे और उसके नितम्बों के नीचे मेरा पप्पू पीस रहा था। वो अपनी चूत और नितम्बों को भी थोड़ा-थोड़ा सा घिस रही ती। ऐसा करते हुए उसने अपनी जीभ की नोक से मेरी नाक चाटी और उसकी नोक अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। आईलाआआआ… मैं तो मस्त ही हो गया।

प्यारे दोस्तों आप सोच रहे होंगे कि इसमें मस्त होने वाली क्या बात है? नाक होंठ गाल तो हर लड़की चूस ही लेती है। आप गलत सोच रहे हैं। शायद आप औरतों की इस अदा को नहीं जानते। मेरी प्यारी पाठिकाएँ ज़रूर हँस रहीं हैं। वो अच्छी तरह इसका मतलब जानती हैं। नहीं समझे ना? चलो मैं बता देता हूँ…

इस बात से आप सहमत हैं ना कि जब कोई लड़का या आदमी किसी लड़की या औरत को कहता है कि तुम बहुत ख़ूबसरूत हो तो इसका मतलब साफ़ होता है कि वह उसे चोदना चाहता है। दूसरी बात जब आदमी किसी लड़की के होंठ चूसता है तो वो मन में सोच रहा है कि ये उसकी चूत वाले होंठ ही हैं। और इसी तरह जब कोई लड़की किसी आदमी की नाक चूस रही होती है तो अनजाने में उसका लण्ड ही चूस रही है। थोड़ा सा सब्र रखिए अभी पता चल जाएगा।

“निशा एक बताना तो मैं भूल ही गया” मैंने कहा।

“ऊँहह… अब कुछ मत बोलो बस मुझे प्यार करने दो अपने मिट्ठू को।” उसने फिर मेरे होठों को चूम लिया।

“आदमी के लण्ड की लम्बाई बिना नापे पता करनी हो तो कैसे पता करेंगे?”

“कैसे… क्या मतलब?”

“आदमी की नाक की लम्बाई से ३ गुणा बड़ा उसका लण्ड होता है।” मैंने कहा तो हैरानी से वो मेरी नाक देखने लगी “ओह… नो…”

“नाप कर देख लो” वो मेरी नाक चूमना छोड़ कर एक ओर हो गई और मैं बैठ गया। अब उसने मेरे पप्पू की ओर देखा और हाथ में लेकर उसे मसलने लगी। पप्पू तो बस इसी इन्तज़ार में था। उसने फिर ठुमके लगाने चालू कर दिए। दोस्तों अब लण्ड चुसवाने की बारी थी। मैं जानता हूँ पहली बार लण्ड चूसने में हर लड़की नखरे करती है और उसे गन्द काम समझती है। पर मैं भी प्रेम-गुरु ऐसे ही नहीं बना हूँ। मैंने भी पूरा कार्यक्रम की थी इस उत्पाद की लाँचिंग की।

मैंने उससे कहा “मेरी मैना मैं एक बार तुम्हारी मुनिया को चूसना चाहता हूँ।” भला उसे क्या ऐतराज़ हो सकता था। मैं लेट गया और उसके पैर अपने सिर के दोनों ओर कर दिए जिससे उसकी चूत मेरे मुँह के ठीक ऊपर आ गई। हम दोनों अब 69 की मुद्रा में थे। निशा मेरे ऊपर जो थी। मेरा पप्पू ठीक उसके मुँह के सामने था। मैंने झट से चूत की पंखुड़ियों को चौड़ा किया और गप्प से अपनी जीभ उस गुलाबी खाई में उतार दी। उत्तेजना में उसका शरीर काँपने लगा। मैंने उसकी चूत को ज़ोर-ज़ोर से चूसना चालू कर दिया, अब उसके पास मेरे लंड को चूसने के अलावा क्या रास्ता बचा था।

उसने पहले मेरे पप्पू के सुपाड़े को चूमा और उसपर आए वीर्य की कुछ बूँदों चखा और फिर गप्प से उसे मुँह में भर कर चूसने लगी। आह… उसका नरम गीला और थोड़ा कुनकुना अहसास मुझे मस्त करक गया। मेरा पप्पू तो निहाल ही हो गया। मैंने अपनी जीभ उसकी गाँड के भूरे छेद पर भी फिरानी चालू कर दी। मुझे अपना पाँचवा उत्पाद भी तो लाँच करना था। अरे भाई गाँड भी मारनी थी ना। उसके लिए निशा को तैयार करना सबसे मुश्किल काम था। मैंने ४-५ बार अपनी जीभ उसकी गाँड पर फिराई तो वो एक किलकारी मारते हुए फिर झड़ गई। मैं अपना वीर्य उसके मुँह में अभी नहीं छोड़ना चाहता था। मुझे तो पहले उसकी गाँड का उदघाटन करना था। और फिर जैसा मैंने सोचा था वही हुआ।

निशा ज़ोर-ज़ोर की साँसे लेती हुई एक ओर लुढ़क गई। उसके उरोज साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। आँखें बन्द थीं। अचानक वह उठी और मेरे ऊपर आ कर मुझे कस कर अपनी बाँहों में जकड़ लिया। मैंने अपनी ऊँगली उसकी गाँड की छेद पर फिरानी शुरु कर दी। उफ्फ… क्या खुरदरा एहसास था। वो तो बस आँखें बन्द किए मुझसे चिपकी पड़ी थी। मैंने हौले से उसके होंठों पर एक चुम्मा लिया और कहा “मेरी रात कली, मेरी मैना क्या हुआ?”

“बस अब कुछ मत बोलो, एक बार मुझे फिर से…” और उसने मुझे चूम लिया।

“निशा एक और मज़ा लोगी?”

“क्या मतलब?” उसने चौंकते हुए मेरी तरफ़ देखा।

“मैं और मधु स्वर्ग के दूसरे द्वार का भी ख़ूब मज़ा लेते हैं।”

“क्या मतलब… वो… वो.. ओह… नो… नहीं…” वो तो ऐसे बिदकी जैसे किसी काली छतरी को देख कर भैंस बिदकती है “ओह जीजू तुम्हारा दिमाग तो ठीक है ना… क्या बात कर रहे हो?”

“अरे मेरी मैंना रानी औरत के तीन छेद होते हैं और तीनों में ही चुदाई की जाती है। चुदाई का असली आनन्द तो इस द्वार में ही है। एक बार मज़ा लेकर ते देखो, फिर तो रोज़ यही कहोगी कि अपना पेन ड्राईव अगले छेद में नहीं, मेरे पिछले छेद में ही डालो।”

“नहीं आप झूठ बोल रहे हैं। भला कोई इसमें करता है?”

“अरे इसमें झूठ वाली क्या बात है। मधु तो इसकी दीवानी है। हल तो हर शनिवार को इसका मज़ा लेते हैं।”

“ओह… अब मैं समझी मधु दीदी रविवार को थोड़ी टाँगें चौड़ी करके… ओह… इस्स्स…” जिस तरह निशा शरमाई थी मैं तो मर ही मिटा उसकी इस अदा पर। चिड़िया फँस जाएगी।

“देखो अब तक मैंने जितनी भी बातें तुम्हें बताई हैं क्यो कोई भी बात ग़लत निकली?”

“पर वो… वो.. इतना मोटा मेरे छोटे से छेद में… ओह नो… मुझे डर लगता है।” वो कुछ सोच नहीं पा रही थी।

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“अच्छा चलो एक टोटका तुम्हें दिखाता हूँ। अगर तुम्हें सही लगे तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं, गाँड मारना रद्द” मैंने कहा

“वो क्या है?”

दोस्तों अब तो भरतपुर लुटने को तैयार होने ही वाला है। बस २ मिनट की ओर देरी है। मैंने उससे कहा कि तुम उकड़ूँ बैठ जाओ। वह बैठ गई। अब मैंने तकिये के नीचे से बोरोलीन की ट्यूब निकाली ओर उसकी उँगली पर एक मटर के दाने जितनी क्रीम लगा दी। फिर उससे कहा कि तुम इसी अपनी मुनिया की पड़ोसन (गाँड पर यार) लगा लो।

उसने ऐसा ही किया। अब मैंने उससे कहा कि खड़ी हो जाओ। वह खड़ी हो गई। फिर मैंने उसे बैठ जाने को कहा और एक छोटा सा शीशा जो मैंने उसके लैपटॉप के बैग से निकाला था उसकी गाँड की छेद पर रख दिया और कहा कि इस शीशे में अपनी रानी की शक्ल तो देखो जितनी दूर तक क्रीम फैल गई है, अगर लंड की मोटाई उस घेरे जितनी या कम है तो गाँड रानी को कोई परेशानी नहीं होगी। क्रीम का घेरा आयोडेक्स के शीशी के ढक्कन जितना था। मेरा लंड भी कमोबेश उतना ही मोटा तो है।

उसे तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। “पर… वो… वो… नहीं मुझे बहुत डर लग रहा है। सुना है इसमें करने पर बहुत दर्द होता है।”

“अच्छा चलो तुम्हें दर्द होगा तो नहीं करेंगे। एक बार प्रयास करने में क्या हर्ज़ है?”

“पर वो… वो ज़्यादा दर्द तो नहीं होगा ना कहीं…?” वो कुछ हिचकिचा रही थी। पर मेरा फ्लो-चार्ट और कार्यक्रम बिल्कुल पक्का था। अब बचना कहाँ संभव था।

मैंने उसे करवट लेकर सो जाने को कहा। वो बाईं करवट के बल लेट गई औऱ अपनी दाईं टाँग को सिकोड़ कर अपने सीने की ओर कर लिया। शायद आप सोच रहे होंगे ‘गाँड मारने का ये कौन सा आसन हुआ। गाँड तो कुत्ते अथवा बिल्ली की मुद्रा में ही अच्छी तरह मारी जा सकती है?’

आप ग़लत सोच रहे हैं। लगता है आपने गाँड ना तो मरवाई है और ना ही मारी है। पहली गाँड चुदाई बड़ी ही सावधानी से की जाती है। पहली गाँड चुदाई में लड़की को ज़्यादा दर्द नहीं होना चाहिए नहीं तो बाद में लड़की कभी गाँड नहीं मरवाएगी। अब मैं घुटने मोड़कर उसकी बाईं जाँघ पर बैठ गया। इस तरह से जब मैं उसकी गाँड में लंड डालूँगा तो वह आगे की ओर नहीं खिसक पाएगी। कुतिया या घोड़ी शैली में यही तो मुश्किल होती है, जब भी आप धक्का लगाएँगे तो लड़की आगे की ओर हो जाएगी और लंड उसकी गाँड से फिसल जाएगा। ५-७ धक्कों के बाद आप बाहर ही खल्लास हो जाएँगे।

अब मैंने बोरोलीन की ट्यूब निकाली और टोपी खोल कर उसका मुँह उसकी गाँड की सुनहरी छेद पर लगा कर थोड़ा सा अन्दर किया। पहले से थोड़ी बोरोलीन लगी होने से ट्यूब की नॉब अन्दर चली गई। अब मैंने उस ट्यूब को ज़ोर से भींच दिया।

“उईईईई… जीजूऊऊऊ गुदगुदी हो रही है” निशा थोड़ा सा चिहुँकी। वो आगे को सरक ही नहीं सकती थी।

मैंने आधी से ज़्यादा ट्यूब उसकी गाँड में खाली कर दी। अब धीरे-धीरे मैंने उसकी गाँड के छेद पर मालिश करनी शुरु कर दी। बोरोलीन अन्दर पिघलने लगी थी। और मेरी उँगली उसकी गाँड की कसी हुई छेद के बावज़ूद भी आराम से अन्दर जाने लगी थी, प्यार से धीरे-धीरे। मुझे इस काम में कोई जल्दी नहीं करनी थी। मैं तो गाँड मारने का पक्का खिलाड़ी हूँ। निशा आआआहहह… उउउऊऊऊहहहह करने लगी। कोई ४-५ मिनट की घिसाई और उँगलीबाज़ी से उसकी गाँड तैयार हो गई थी। “ओह… जीजू अब डाल दो”

शाबास मेरी मैंना यही तो मैं चाहता था। अब मैंने वैसलीन की डिब्बी उठाई और लगभग आधी शीशी क्रीम अपने पप्पू पर लगा दी। आपको तो पता है मेरा सुपाड़ा आगे से थोड़ा पतला है। गाँड मारने के लिए अति उत्तम। मैंने सुपाड़े को उसकी गाँड पर लगा दिया। आह… क्या मस्त छेद था। दो गोल पहाड़ियों के बीच एक छोटी सी गुफ़ा जिसका दरवाज़ा कभी बन्द कभी खुल रहा था। निशा आआहहहह… उँहहहह… ओह… उउउऊऊईई.. किए जा रही थी।

दोस्तों और सहेलियों अब मेरे पाँचवें और अन्तिम उत्पाद की लाँचिंग थी। अगर आपको थोड़ा बहुत गाँडबाज़ी का शौक और अनुभव हो तो आप ज़रूर जानते होंगे कि सबसे कठिन काम गाँड के छल्ले को पार करना होता है। एक बार अगर सुपाड़ा उस छल्ले को पार कर गया तो समझो क़िला फ़तह हो गया। अन्दर तो बस गुब्बारे की तरह खाली कुँआ होता है। आप को बता दूँ लण्ड चाहे जितना भी बड़ा क्यों ना हो, गाँड में जड़ तक चला जाएगा बस छेद का घेरा एक बार पार होना चाहिए।

आप सोच रहें होंगे यार एक धक्का लगाओ और ठोंक दो कीला, क्यों तड़पा रहे हो अपने लंड और बेचारी गाँड को। कहीं आप का भी खड़ा तो नहीं हो गया या फिर मेरी प्यारी पाठिकाओं ने अपनी मुनिया में उँगली करनी तो शुरु नहीं कर दी? मुझे पक्का यकीन है आप की पैन्टी ज़रूर गीली हो गई है। चाहो तो देख लो।

मैंने एक उँगली उसकी चूत में डाल कर अन्दर-बाहर करनी शुरु कर दी औऱ एक हाथ से उसकी घुण्डियाँ मसलनी शुरु कर दी। उसका एक बार और झड़ना ज़रूरी था ताकि गाँड के छेद को पार करवाने में उसे कम से कम दर्द हो। ३-४ मिनट की उँगलीबाज़ी और चुचियों को मसलने से वह उत्तेजित हो गई। उसका शरीर थोड़ा सा अकड़ने लगा और वो ऊईईई.. माँ.आआ…. ओओओहहह ययाआआआआ… करने लगी। उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। मैंने अपनी उँगली निकाली और अपने मुँह में डाल कर एक चटकारा लिया। फिर मैंने दुबारा उँगली उसकी चूत में डाली और उसे भी चूत-रस चटाया। निशा तो मस्त ही हो गई। उसकी गाँड का छेद जल्दी-जल्दी खुलने और बन्द होने लगा था।

यही समय था स्वर्ग के दूसरे द्वार को पार करने का। जैसी उसकी गाँड खुलती मेरा सुपाड़ा थोड़ा सा अन्दर सरक जाता। अब तक उसकी गाँड का छेद ५ रुपए के सिक्के जितना खुल चुका था और लगभग पौना इंच सुपाड़ा अन्दर जा चुका था, सफलतापूर्वक बिना किसी दर्द के। मैंने उसकी कमर को पकड़ा और ज़ोर का (धक्का नहीं यार) दबाव डालना चालू किया। (मुर्गी को हलाल किया जाता है झटका नहीं) गाँड अन्दर से चिकनी थी और निशा मस्त थी। गच्च से ३ इंच लण्ड घुस गया और इससे पहले कि निशा की चीख हवा में गूँजे मैंने उसका मुँह अपने दाएँ हाथ से ढक दिया।

वो थोड़ा सा कसमसाई और गूँ-गूँ करने लगी। मैं शान्त रहा। मेरा ३ इंच लण्ड अन्दर जा चुका था। अब फिसल कर बाहर नहीं आ सकता था। मुझे डर था कि चूत की तरह गाँड से भी ख़ून ना निकल जाए। लेकिन बोरोलीन और वैसलीन की चिकनाई की वज़ह से उसकी गाँड फटने से बच गई थी। इसका एक कारण और भी था मैंने लण्ड अन्दर डालते समय केवल दबाव ही दिया था धक्का नहीं मारा था।

२-३ मिनट आह… ऊहह… करने के बाद वह शान्त हो गई। मैंने अपना हाथ हटा लिया तो वह बोली “मुझे तो मार ही डाला”

“अरे मेरी मैना अब देखना तुम अपने मुँह से कहोगी और ज़ोर से ठोंको और ज़ोर से”

“हटो गन्दे बच्चे !”

अब धीरे-धीरे धक्के लगाने का समय आ गया था। मैंने अपना लण्ड अन्दर-बाहर करना शुरु कर दिया। निशा ने अपने गाँड का छेद सिकोड़ने की कोशिश की तो मैंने उसे समझाया कि वो कतई ऐसा न करे। मैंने उसे बताया कि अगर उसने गाँड को सिकोड़ तो अन्दर लंड और सुपाड़ा दोनों फूल जाएँगे और उसे अधिक तक़लीफ होगी। दोस्तों आपको पता होगा कि गाँड मरवाते समय अगर लड़की अपनी गाँड को अन्दर की ओर सिकोड़ ले जैसे मूत रोकने के लिए किया जाता है तो लण्ड और सुपाड़ा अन्दर फूल जाते हैं और फिर मोटे लण्ड से गाँड फटने को कोई नहीं रोक पाएगा।

मैंने अपना लंड जड़ तक अन्दर कर दिया. निशा तो मस्त हो गई। वो तो बस उईई… माँ…. ही करती जा रही थी, मीठी सी सीत्कार। मैं अपना लण्ड अन्दर-बाहर ही करता जा रहा था। वैसे पूछो तो गाँड का असली मज़ा तो बस ३-४ इंच तक ही होता है, उसके आगे तो पता ही नहीं चलता, आगे तो कुँआ ही होता है।

निशा अब पेट के बल हो गई थी, उसने अपने दोनों पैर चौड़े कर दिए और नितम्ब ऊपर उठा दिए। मेरा लंड उसकी गाँड में कस गया पर चिकनाई के कारण अन्दर-बाहर होने में कोई दिक्क़त नहीं थी। हर धक्के के साथ निशा की सीत्कार निकल जाती और वह अपने नितम्ब और ऊपर कर लेती. साली पहली गाँड चुदाई में ही इतनी मस्त हो गई, मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी ज़बर्दस्त गाँड होगी। ऐसा नहीं था कि मैं बस धक्के ही लगा रहा था, मैं तो उसकी चूत में भी उँगली कर रहा था, कभी उसकी पीठ चूमता, कभी उसके कान काटता। वो तकिए से सिर लगाए आराम से अपना नितम्ब ऊपर-नीचे करती हुई ओओईईई… आआआहहह… ययाआआआ… कर रही थी।

मैंने १५-२० औरतों की गाँड तो ज़रूर मारी होगी, पर निशा जैसी गाँड तो किसी की भी नहीं थी। मधु की गाँड जब भी मैंने पहली बार मारी थी तो वो तो बेहोश सी हो गई थी पर मेरी ये मैना तो सबसे मस्त निकली। मैं मिक्की की गाँड नहीं मार पाया था पर मेरा अनुमान है कि निशा की गाँड मिक्की से भी हालात में कमतर नहीं है। कोई २०-२५ की गाँड चुदाई के बाद मुझे लगा कि अब मंज़िल नज़दीक आने वाली है तो मैंने निशा से कहा “मेरी मैना, तोता अब उड़ने वाला है”

निशा हँसने लगी “अभी नहीं, एक बार मुझे कुतिया बनाकर भी करो।”

और फिर वो अपने घुटनों के बल हो गई। मैं समझ गया साली गोरी फिरंगन और ब्लैक-फॉक्स वाली ब्लू-फिल्म की तरह चुदवाना चाहती है। मैंने उसकी कमर पकड़ी और लंड अन्दर डाल कर धक्के लगाने शुरु कर दिए। उसकी गाँड का छल्ला ऐसे लग रहा था जैसे किसी बच्ची के हाथ में पहनने वाली लाल रंग की चूड़ी हो या एक पतली सी गोल लाल रंग की ट्यूब-लाईट हो जो जल और बुझ रही हो। उसकी गाँड का छल्ला ऐसे ही अन्दर-बाहर हो रहा था। उसने अपना सिर तकिए से लगा लिया और मेरे आँडों को ज़ोर से अपनी मुट्ठी में लेकर दबाने लगी।

मेरे ८-१० धक्कों और चूत में उँगलीबाज़ी करने के कारण निशा की चूत ने पानी छोड़ दिया और उसने एक मीठी सी सीत्कार लेकर अपनी गाँड सिकोड़ी। इसके साथ ही मेरे लंड ने भी ७-८ पिचकारियाँ उसकी गाँड में छोड़ दीं। उसकी गाँड मेरे गरम और गाढ़े वीर्य से लबालब भर गई। जैसे-जैसे मेरे धक्कों की रफ़्तार कम होती गई वो नीचे होती गई और फिर मैं उसके ऊपर लेटता चला गया। मैंने उसे बाँहों में भर रखा था। उसके दोनों उरोज मेरे हाथों में थे।

कोई १० मिनट तक आँखें बन्द किए हम लोग ऐसे ही पड़े रहे। फिर निशा उठ खड़ी हुई। वो लंगड़ाती सी बाथरूम की ओर जाने लगी तो मैंने उसका हाथ पकड़ कर फिर अपनी गोद में बैठा लिया। “ओह सारा पानी मेरी जाँघों पर फैलता जा रहा है, मुझे गुदगुदी हो रही है.. ओह… छोड़ो साफ़ तो करने दो।”

पर मैंने उसे नहीं जाने दिया। मैंने तकिए के नीचे से नैपकीन निकाली और निशा की चूती (रिसती) हुई गाँड को साफ कर दिया। उसकी गाँड का छेद अब बिल्कुल लाल होकर ५ रुपए के सिक्के जितना छोटा हो गया था। छेद की शक्ल अंग्रेजी के “O” जैसी हो गई थी। मैंने फिर उसका सिर पकड़ कर उसके होंठों का एक चुम्बन ले लिया। “थैंक यू मेरी मैना”

“ओह… थैंक यू मेरे मिट्ठू” उसने भी मुझे चूम लिया। वो बिस्तर पर उँकड़ू बैठी अपनी चूत और गाँड के छेदों को देख रही थी। उसने कहा, “देखो मेरी मुनिया और उसकी सौतन का क्या हाल कर दिया है तुमने”

“उसकी चूत सूज कर लाल हो गई थी और गाँड का रंग भी भूरे से लाल हो गया ता। उसकी चूत तो ऐसे लग रही थी जैसे किसी ने छोटी सी परवल को बीच में से चीर कर चौड़ा कर दिया हो। उसकी दरार तो ऐसे लग रही थी जैसे किसी नव-विवाहिता ने अपनी मोटी सी माँग भर रखी हो बिल्कुल लाल-सुर्ख। फिर मैंने कहा “अरे इसकी सुन्दरता तो और भी बढ़ गई है, वाह कितनी प्यारी लग रही है। केशर-क्यारी के बीच, गुलाब का खिला हुआ फूल हो जैसे। प्लीज़ एक चुम्मा लेने दो ना।” मैं उसकी ओर बढ़ा तो वो पीछे सरकती हुई बोली “हटो मतलबी कहीं के, औरतों की भावनाओं का तुम्हें क्या पता!”

“क्यों क्या हुआ मेरी मैना?”

“आपने अपनी मनमर्ज़ी आख़िर कर ही ली ना? अब झूठा प्यार दिखा रहे हो।”

“वो कैसे?”

“ऐसे तो बड़े मिट्ठू बने फिरते थे मधु दीदी के?”

“ओह.. वो.. .” मेरी हँसी छूट गई। ‘मेरी रात-कली ! तुम हम भँवरों की क़ैफियत (आदत) क्या जानो, कभी एक फूल पर चिपक कर नहीं बैठते।’ पर मैंने कहा “वो तो मैं अब भी उसका मिट्ठू हूँ।”

“मैं भी यही देखना चाहती थी उस एकता कपूर को यही तो दिखाना था कि ये मिट्ठू मियाँ उन पर कितना लट्टू है। मेरे मन में भी उसे नीचा दिखाने की कहीं ना कहीं इच्छा थी। शुरु में तो मैं तुम्हें निरा लल्लू ही समझ बैठी थी पर तुम तो बड़े कलाकार निकले !” उसने कहा।

“ओह छोड़ो इन नीचे-ऊपर की बातों को। देखो मेरा पप्पू तुम्हारे लिए कैसे तड़प रहा है” मेरे शेर ने फिर से ठुमके लगाने शुरु कर दिए थे। मैं एक बार उसकी गाँड और मारना चाहता था। मैंने जब आगे बढ़ कर उसे बाँहों में लेना चाहा तो वह बोली, “ठहरो !”

“क्या हुआ?”

“नहीं इस बार मैं ऊपर आऊँगी…” और इससे पहले कि मैं कुछ समझता उसने मुझे एक धक्का दिया और उछल कर मेरे पेट के ऊपर बैठ गई। मुझे बाद में समझ आया कि वह बार-बार ऐसा क्यों कर रही है। दरअसल उसने ब्लू-फिल्म में आँटी को उस लड़के के ऊपर आकर चुदते हुए देखा था। साली उसी आसन में मुझसे भी चुदवाना चाहती थी। कोई बात नहीं, चाकू ख़रबूजे पर गिरे या ख़रबूजा चाकू पर पड़े, कटना तो ख़रबूजे को ही है ना। क्या फ़र्क पड़ता है।

मेरा पप्पू भला ऐसा मौका क्यों छोड़ता। वो तो फिर तैयार हो चुका था और उसकी गाँड पर ठोकर लगा रहा था। उसे एक हाथ पीछे किया, थोड़ी सी ऊपर उठी और मेरे लंड को अपनी चूत के मुँह पर लगाकर गच्च से नीचे बैठ गई। मेरा लंड एक कही झटके में जड़ तक उसकी चूत में समा गया। उसके मुँह से ज़ोर की सिसकारी निकली “ओओईईईई… माँआआआआआ…” उसने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। मैंने उन्हें चूम लिया। अब मैंने अपने एक हाथ से उसकी कमर को पकड़ा और दूसरे हाथ की उँगली से उसकी गाँड का छेद टटोला। एक ही चुदाई में वो ढीला हो गया था। मैंने गच्च से अपनी तर्जनी जड़ तक उसकी गाँड में ठोंक दी। निशा ज़ोर से चीखी…”

“ऊऊईईईईई माँआआआआ.. क्या करते हो… ओह जीजू, तुम भी एक नम्बर… ओह नो.. तुम पक्के दो नम्बर के बदमाश हो” और उसने मेरे होंठ इतने ज़ोर से काटे कि उनसे खून ही निकल आया। पर मुझे उसका कोई दर्द या ग़म नहीं था। बाहर पानी बरसना बन्द हो गया था पर हमारे अन्दर उबलता पानी तो बन्द होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

दोस्तों अब मुठ मारना बन्द करो, अरे भाई आज रात के लिए कुछ तो बचा कर रखो, क्या आप को रोज़ गाँड नहीं मारनी? और मेरी प्यार पाठिकाओं, आप भी अपनी गीली पैन्टी में उँगली करना छोड़ो और आज रात की तैयारी करो।

सप्रेम धन्यवाद। आपका प्रेम गुरु

यहाँ पर इस कहानी का मूल्याँकन करते समय कहानी के तीनों भाग ध्यान में रख कर ही मूल्यांकन करें। 0732

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