बाथरूम का दर्पण-3

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मेरे होंठ उसके गाल पर थे और हाथ चुची पर! मैंने पूछा- सच है या नहीं? अब उसने पूरी ताकत से खुद को छुड़ा लिया और… दौड़ कर बेडरूम में चली गई।

मैंने सोचा कि हाथ छोड़कर मैंने गलती की है, सोचा, अब क्या करूँ? फिर दिमाग ने कहा- सब कुछ यहाँ पर थोड़े हो सकता है! बेडरूम में जाओ, बाकी का काम तो वहीं पर होगा!

अभी रात के 9:30 बजे थे, मैं तुरंत ही रमा के बेडरूम में पहुँचा, बड़ा सुन्दर कमरा था, डबलबेड, ड्रेसिंग टेबल, नक्काशी वाली अलमारी, एक मेज पर कंप्यूटर रखा था, कोने में एक सुन्दर सा छत्र वाला लेम्प रखा था। कमरा में ए.सी. भी लगा हुआ था।

रमा बिस्तर पर बेसुध सी पड़ी हुई थी, सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी, स्तन बड़े बड़े गोलों के रूप में कपड़ों से बाहर निकलने को बेताब थे, एक हाथ को कोहनी से मोड़कर कलाई से आँखों को ढक रखा था, मेक्सी घुटनों से ऊपर को सरक गई थी जिससे गोरी, मांसल एवं चिकनी जांघें क़यामत ही ढा रही थी।

एक पल ऐसा लगा कि मेक्सी को ऊपर उठाकर चूत को चोद डालूँ पर जल्दबाजी में बात बिगड़ सकती थी, मैंने कहा- मैडम, क्या हुआ? आप इस तरह क्यूँ भाग आई?

और उनसे सटकर बैठ गया, उसके हाथ को पकड़कर हटाया, तब भी उसने आँखें नहीं खोली। मैंने लगे हाथ गालों पर चुम्बन कर दिया। उसका सारा बदन ऐसे कांप रहा था जैसे ठण्ड के दिन हों!

कहने लगी- प्लीज़, मुझे मत बहकाओ! मैंने आज तक अपने पति से बेवफाई नहीं की, न ही करना चाहती हूँ! मैं ऐसी औरत नहीं हूँ जैसी तुम समझ रहे हो!

मैंने सोचा- यह डायलोग तो हर उस औरत ने पहली बार जरूर बोला है जिसे मैंने पहले चोदा है। लगता है सारी औरतें एक जैसी होती हैं, मैंने कहा- मैडम, आपका रूप है ही ऐसा सुन्दर, यह गोरा रंग, सुन्दर चेहरा, कटीले नयन, सुतवां नाक, सुर्ख होंठ, सुराहीदार गर्दन, पहाड़ के शिखर जैसे तुम्हारे वक्ष, पतली कमर, उभरे गोल नितम्ब, मक्खन जैसी चिकनी गोरी मांसल टांगें! इन्हें देखकर इन्सान तो क्या देवता भी भटक जाये!

तो रमा ने कहा- रोनी, मैं कोई भी गलत काम नहीं करना चाहती। प्लीज़, छोड़ दो मुझे!

मैंने कहा- रमा जी, मैं आपकी मर्जी के बगैर कोई भी काम नहीं करूँगा, मुझे सिर्फ आपके इस भरपूर यौवन, सुन्दर जिस्म और लाजबाब हुस्न को बेपर्दा देखने की इजाजत दो जिसे मैं सिर्फ देखना और सहलाना चाहता हूँ, चूमना चाहता हूँ क्यूंकि आप जैसी सुन्दर हसीना मैंने आज तक इतने करीब से नहीं देखी।

तो उसने इतना ही कहा- मुझे डर लग रहा है!

मैं उससे सटकर लेट गया और उसके गले और कान के पास चूमने लगा। रमा ने सिसकारी लेना शुरू कर दिया था।

अब मेरा एक हाथ उसके कपड़ों के अन्दर वक्ष पर घूम रहा था, दूसरा हाथ पीठ के नीचे था जो उसकी मेक्सी की बेल्ट खोल रहा था। रमा कसमसा रही थी, मैं समझ गया था कि

अब दिल्ली दूर नहीं है!

बेल्ट खोलकर मैंने उसकी मेक्सी को उतारना चाहा तो उसने मेरे हाथ पकड़ लिए। मेक्सी ऊपर गले तक आ गई थी, संतरे जैसे चूचे ब्रा में से दिख रहे थे। मैंने अपना मुँह उन पर रखा और होंठों से दबाने लगा तो रमा ने अपने आप को शिथिल छोड़ दिया।

मैंने मौका देखकर मेक्सी सर से बाहर निकाल दी। रमा ब्रा-पेंटी में क़यामत सी हसीना लग रही थी। मेरा लंड तो बहुत देर से पैंट में बैचैन हो रहा था। मुझे अपने कपड़े भी उतारने थे, मैंने कहा- रमा जी, बहुत गर्मी लग रही है, ए.सी. ऑन कर लूँ क्या? वो बोली- कर लो!

मैं बिस्तर से उतरकर अपनी शर्ट और जींस को जल्दी से उतार और ए.सी. चालू करके बिस्तर पर आ गया। रमा घुटने मोड़कर अपनी पेंटी और हाथों से ब्रा को ढके हुए थी।

अब मैं सीधा उसके ऊपर आ गया, होंठ से होंठ, सीने से सीना, लंड से चूत, टांगों से टाँगें दबा ली थी। धीरे से पीठ को सहलाते हुए ब्रा के हुक को खोल दिया और ब्रा को हटा दिया। अब अनावृत तने हुए स्तन मेरी आँखों के सामने थे, नीचे मेरा लंड 90 अंश का कोण बना रहा था जिससे चूत की दरार पर दबाव पड़ने से रमा के पैर थोड़े से फ़ैल गए थे और लंड चड्डी सहित अन्दर को धंस सा गया था।

रमा के मुँह से आ..ह.. से ..सी… सी… की आवाज आने लगी थी, बोली- तुमने वादा किया है कि हद पार नहीं करोगे? मैंने कहा- मुझे याद है कि देखना चूमना और सहलाना है, आगे कुछ नहीं करना है!

मैंने एक स्तन को मुँह में भर लिया, दूसरे को हाथ से मसलने लगा। मुझे लग रहा था कि मेरे लंड के आँसू आने लगे थे, यह समझ नहीं आ रहा था कि गम के हैं या ख़ुशी के! वो बाहर आने को तड़प रहा था।

मैंने सोचा कि यदि रमा को चोदा तो हो सकता है मेरा लंड समय से पहले ही शहीद हो जाए, इसको एक बार स्खलित कर देना ही उचित होगा। मैंने रमा से कहा- मैं बाथरूम जा रहा हूँ।

बाथरूम में जाकर रमा की संतरे जैसी गोलाइयों को याद करके मुठ मारा, बहुत सारा माल निकला, फिर लंड को अच्छी तरह से धोया, पेशाब किया और कमरे में आ गया।

रमा अपने हाथ से चूत को मसल रही थी, दूसरे हाथ से चुची को! मुझे देखकर उसने हाथ हटा लिए। मैं चड्डी उतारकर फिर से रमा के ऊपर था, स्तनों को चूस चूस कर लाल कर दिया मैंने, फिर सहलाते हुए नीचे को आ रहा था, एक हाथ स्तन पर दूसरा नाभि के पास सहला रहा था, होंठ ऊपर से नीचे चुम्बन का काम कर रहे थे। धीरे धीरे चेहरे को चूत के सामने ले आया कमर पर हाथ फिराते हुए पेंटी पर ले गया। पेंटी चूत के स्थान पर फूली थी और नीचे की ओर बुरी तरह से चूत रस से भीग गई थी।

मैंने पेंटी को नीचे खिसकाना चाही तो रमा ने टांगें आपस में भींच ली।

मैंने कहा- सिर्फ चूमना है! पेंटी को निकाल लेने दो प्लीज़!

बड़ी मुश्किल से वो राजी हुई, एक झटके से पेंटी निकाल फेंकी। अब रमा मेरे सामने एकदम निर्वस्त्र एवं बेपर्दा लेटी हुई थी, मैं उसकी चूत के दर्शन करने लगा, एकदम नई और कोरी लग रही थी, त्वचा एकदम मुलायम थी, थोड़ी देर पहले ही तो शेविंग हुई थी चूत को खोलकर देखा तो गुलाबी छिद्र कमल की पंखुड़ी जैसा दिखाई दिया।

मैंने चूत का चूमा लिया तो रमा चिहुंक उठी और मेरे सर को थाम लिया। मैंने चूत के ऊपर मदनमणि को जीभ से सहला दिया, होंठों से भी दबाकर खींचा। अब कमरे की शांति रमा की आहों से भंग हो रही थी, मेरा लंड फिर से खड़ा होने लगा था।

अब रमा मुझे अपनी ओर खीच रही थी, मैंने रमा को बिस्तर पर ही खड़ा करके निहारा फिर पूरे शरीर को चूम डाला।

अब रमा से ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था, वो मेरी बाँहों में झूल गई।

मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके ऊपर आकर स्तन दबाने लगा, वे सच में बहुत कठोर हो गए थे। मैं स्तनाग्र को मुँह में लेकर चूसने लगा। मेरा लंड पूरी तरह से तन्ना गया था, वह तो अपने लिए जगह खोजने में लगा था और धीरे धीरे मदनमणि को ठोकर मार रहा था। रमा की आह रुकने का नाम नहीं ले रही थी। मैं भी यही चाहता था!

अबकी बार दोनों चूचियों को दोनों हाथ से पकड़ कर अपने होंठों को रमा के होंठ पर रख कर जीभ को मुँह में डाल दिया। वह मेरी जीभ को सिसकारते हुये चूस रही थी। मैंने मौका देखकर लंड को सही स्थान पर लेकर थोड़ा दबाव डाला तो सुपारे का आगे का भाग चूत के मुँह पर फिट हो गया।

मैं रमा की मर्जी का इंतजार कर रहा था वादा जो किया था।

अब रमा ने मुझे जोरों से भींचना चालू कर दिया, नाखून भी गड़ा डाले! मैं स्तन और मुखचोदन में ही अपना ध्यान केन्द्रित किये हुए था।

अब रमा कसमसा रही थी, अपने चूतड़ हिलाने की कोशिश कर रही थी।

मैंने थोड़ी सी ढील दी तो उसने गाण्ड को झटके से ऊपर उठा दिया और आधा लंड चूत मे समां गया।

मैंने कहा- रमा जी ये…?? जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

तो रमा ने इतना ही कहा- प्लीज़ रोनी… मैं समझ गया पर अंजान बनकर कहा- क्या?

उसने कुछ नहीं कहा बस एक और झटका नीचे से लगा दिया, मेरा सात इंच का लवड़ा उसकी चूत में समां गया था। मैंने अब भी कोई हरकत नहीं की तो उसने मुझे पकड़कर ऐसे पलटी लगाई कि वो ऊपर और मैं नीचे आ गया।

अब वह बिना रुके अपनी गाण्ड उठा-उठा कर मुझे चोद रही थी, पूरा कमरे में हम दोनों की सिसकारियाँ गूंज रही थी। थोड़ी ही देर में उसका बदन अकड़ने लगा, मुँह से बड़ी तेज अजीब सी आवाज आने लगी थी। वो हाँफते हुए मेरे सीने पर गिर पड़ी, मैं उसकी पीठ को सहलाता रहा, मेरा लंड चूत के अन्दर फड़फड़ा रहा था।

अबकी बार मैंने पलटी लगाई, रमा नीचे, मैं ऊपर!

फिर धक्के लगाना चालू कर दिया। थोड़ी देर बाद मैंने रमा को बेड के किनारे पर सरका दिया और पैर बेड से नीचे लटकाने को कहा। मैं बेड के नीचे खड़ा होकर धक्के लगाने लगा। मेरा पूरा लंड चूत के अन्दर तक जाने लगा, हर वार में रमा की आह निकल रही थी, हर पल धक्के की रफ़्तार बढ़ती जा रही थी।

कुछ देर बाद मैंने कहा- रमा, अब मैं झरने वाला हूँ, क्या करूँ? बोली- अन्दर ही कर दो!

फिर मैंने उसकी टांगों को ऊपर उठाकर सीने की तरफ मोड़ दी और तेजी से गहरे धक्के मारने लगा और फिर लंड ने फूलना शुरू कर दिया।

इतने में रमा का शरीर फिर से अकड़ने लगा, वो मुझसे चिपक गई। तभी मेरा वीर्य पिचकारी की तरह रमा की चूत में छूटने लगा। पांच मिनट तक ऐसे ही लेटे एक दूसरे को प्यार करते रहे, फिर उठकर बाथरूम गए और अपने आप को साफ किया।

इस समय रात के सवा गयारह बजे थे। फिर हमने एक साथ खाना खाया। रमा अब भी मुझसे नजरें नहीं मिला रही थी।

मैंने कहा- रमाजी, अगर आप कहें तो मैं रात को यहीं रुक जाऊँ? सुबह 5 बजे चला जाऊँगा। उसने कहा- ठीक है!

खाना खाकर बेडरूम में गए तो फिर इच्छा होने लगी, फिर से चुदाई का कार्यक्रम चालू हो गया।

मैंने उससे लंड को मुँह में लेने को कहा तो उसने हाथ से तो सहला दिया पर मुँह में नहीं लिया। फिर उसको घोड़ी बनाकर और भी कई प्रकार से चोदा।

रात के दो बजे तक की चुदाई में मेरा लंड में और रमा की चूत में दर्द भी होने लगा था।

रमा ने 5 बजे मुझे जगाया, शायद वह रात भर सोई नहीं थी। शायद अपने द्वारा की गई गलती के लिए शर्मिंदा थी।

उसने मुझसे वादा लिया कि आज की रात जो भी हुआ हम दोनों को इसे भुलाना पड़ेगा, इस नियत से कभी तुम हमारे घर नहीं आओगे, न ही किसी से इस बात का जिक्र करोगे। मैंने वादा किया- ऐसा ही होगा।

फिर मैं बाइक उठाकर चला गया सुबह काम जो शुरू करना था।

गाड़ी चलाते हुए सोच रहा था कि अभी तो बाथरूम का दर्पण लगा नहीं और इतना कुछ हो गया जब बाथरूम तैयार होगा और उसमें दर्पण लगेगा तो फिर क्या होगा।

फिर ऐसा हुआ भी! रमा ने ही मुझे बुलाया था!

उसका जिक्र अगली कहानी में… कहानी जारी रहेगी।

आपको मेरी सच्ची कहानी कैसी लगी, अपनी राय जरूर भेजें। महिला, पुरुष एवं सभी उम्र के पाठकों, पाठिकाओं का स्वागत है!

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