पूरी आग लगी है-2

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दोस्तो नमस्कार,

आप सबको मेरी कहानी बहुत पसंद आई और आप सबकी मेल भी मुझे मिली और कुछ दोस्तों ने आगे की कहानी मांगी तो यह है आगे की कहानी :

उसके बाद मेरी नौकरी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी पुणे महाराष्ट्र में लग गई और मैं लगभग दो साल तक वहाँ रहा।

दोस्ती तो कई लड़कियों से हुई लेकिन ज्यादा कुछ नहीं हो पाया। एक लड़की पंकज मेरी ही कंपनी में एक इंजिनियर थी और शायद वो मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी। वो मेरा बहुत ध्यान रखती थी जिससे हमारी अच्छी दोस्ती हो गई थी और शायद वो भी मुझे चाहने लगी थी।

पहले तो मेरी उस पर ऐसी कोई नज़र नहीं थी लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया वैसे ही मेरा आकर्षण भी उसकी तरफ बढ़ता चला गया क्योंकि मैं भी अकेला ही रहता था।

फिर एक दिन मुझे पता चला कि दो दिन बाद कंपनी की छुट्टी है और कंपनी में पार्टी है तो मैंने सोचा कि हो सकता है इस दिन का कुछ फायदा मुझे मिल जाये !

मुझे लगता था कि वो भी सेक्स चाहती थी और शायद मैं भी यही चाहता था। और और वो दिन आ ही गया जब हम मिलने वाले थे।

जैसे ही कंपनी की पार्टी रात को देर से ख़त्म हुई, मैं निकल ही रहा था कि पीछे से आवाज़ आई, मैंने पीछे मुड़कर देखा तो पंकज मेरे पीछे थी।

मेरे तो जैसे दिल की मुराद ही पूरी हो गई हो, वो मेरे पास आई और कहा- कहाँ जा रहे हो?

मैंने कहा- कमरे पर जा रहा हूँ !

तो मुस्कुराई और कहा- मुझे नहीं लेकर चलोगे?

मैंने कहा- नेकी और पूछ पूछ !

मुझे तो जैसे मेरी हर मुराद पूरी हो गई हो, मैं उसे लेकर जैसे ही कंपनी से निकला, वो मुझे देख कर हंसने लगी। मैं उसका इशारा समझ गया, मैंने उससे पूछा- अब तुम कहाँ जाओगी?

तो उसने कहा- मेरी एक दोस्त यहाँ नजदीक ही रहती है, मैं वहाँ चली जाऊँगी।

मैंने कहा- अगर तुम बुरा ना मनो तो मेरे साथ चल सकती हो ! मैं भी अकेला ही रहता हूँ और तुम मेरे साथ रुक सकती हो जिससे तुम्हे सुबह आने में भी परेशानी नहीं होगी।

उसने कहा- आपको परेशानी नहीं होनी चाहिए, मुझे कोई दिक्कत नहीं है।

तो मैंने कहा- मुझे कोई परेशानी नहीं है, तुम मेरे साथ रुक सकती हो !

तो थोड़ी ही देर में हम मेरे फ्लैट पर पहुँच गए। वहाँ पहुँच कर हम अंदर गए और मैंने उसको चाय कॉफ़ी के लिए पूछा तो उसने मना कर दिया। हमने खाना तो खा ही लिया था, अब कपड़े बदल कर मैंने उसे बदलने के लिए मेरा लोअर और टीशर्ट दे दिया।

वो जैसे ही ड्रेस बदल कर बाहर निकली, मैं उसको देखता ही रह गया। वो उन कपड़ों में क्या क़यामत लग रही थी।

वो बाल झटक कर बैठ गई, मुझ पर तो जैसे उसका नशा सा छाने लगा, मैं बस उसे देखता ही जा रहा था।

उसने मुझे कहा- ऐसे क्या देख रहे हो?

मैंने कहा- आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो, जैसे कोई परी आसमान से धरती पर अभी अभी उतरी हो !

ऐसा कहते ही वो शरमाने लगी और कहने लगी- आप मजाक कर रहे हो !

मैंने कहा- नहीं, आज तुम सच में बहुत खूबसूरत लग रही हो और आज तुम्हें प्यार करने को दिल करता है !

वो गुस्सा होने लगी और कहने लगी- मैं जा रही हूँ ! मैं तो आपको बहुत सीधा और अच्छा समझती थी, लेकिन आपने मेरा दिल तोड़ दिया !

वो जैसे ही कपड़े उठाने के लिए आगे बढ़ी मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया और अपनी बाँहों में दबोच लिया। वो मुझसे छुड़ाने की कोशिश कर रही थी लेकिन नाकामयाब रही। मैंने उसे अपनी तरफ घुमाया और उसके होठों पर अपने होंठ रख दिए।

उसने इसका अबकी बार कोई विरोध नहीं किया। लगभग दस मिनट तक मैं उसके होठों का रसपान करता रहा, वो भी मेरा पूरा साथ दे रही थी। उसने अपने हाथों की पकड़ मुझ पर बढ़ा दी थी। मैं अब समझ चुका था कि देर करना ठीक नहीं है, लोहा गरम हैं और चोट मारना ठीक है।

मैंने उसे बिस्तर पर पटक दिया, वो मुझे नशीली नज़रों से देख रही थी। मैं भी बिस्तर पर लेट गया और उसे अपने साथ लेटा लिया और उसे चूचो को छेड़ने लगा। उसकी आँखें बंद होने लगी थी और वो अजीब से आवाजें निकल रही थी- सी सी सी सी आह आह !

फिर मैंने उसके कपड़े निकालने शुरु कर दिए। पहले उसकी टीशर्ट उतार दी और उस पर अपना कब्जा कर लिया। फिर धीरे धीरे से उसको सीधा किया और मैं उसके गुप्तांगों को छूने लगा तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा- आज तक मैं कुंवारी हूँ, मुझे आज तक किसी ने छुआ तक नहीं है। आज मैं अपने आप को आपको सौंप रही हूँ क्योंकि मैं आपको प्यार करती हूँ।

मैंने कहा- प्यार तो मैं भी तुम्हें करता हूँ इसलिए आज तुम्हारे साथ हूँ। लेकिन जैसे तुम्हें पता है कि मैं शादीशुदा हूँ, मैं सिर्फ तुमसे प्यार कर सकता हूँ, तुम्हें अपनी जिन्दगी में कोई जगह नहीं दे सकता। तुम सिर्फ मेरे दिल में रहती हो।उसने कहा- मुझे पता है कि मैं आपकी जीवन साथी नहीं बन सकती इसलिए आज मैं अपने आपको आपके हवाले कर रही हूँ। अगर जिन्दगी में कहीं दोबारा मिले तो हम एक दूसरे को नहीं भूलेंगे।

फिर मैंने उसकी चूत को छुआ, उसकी चूत से पानी निकल रहा था। मैं उसको और गर्म करना चाहता था। फिर धीरे धीरे उसकी लोअर भी उतार दी और मैं उसकी चूत को सहला रहा था।

उसके मुख से अजीब सी सिसकारी निकली और उसने कहा- मुझे और मत तड़पाओ ! आह हा हा हा /माँ मैं मर जाऊँगी !

फिर उसने मेरे कपड़े निकालने शुरु कर दिए।

मैंने भी देर न करते हुए अपने सारे कपड़े उतार दिए और अपना लंड उसके हाथ में थमा दिया। एक बार तो वो उसको देखते ही डर गई, फिर वो बच्चों की तरह उससे खेलने लग गई। वो उसे लॉलीपोप की तरह चूस रही थी। थोड़ी देर तक वो ऐसे ही चूसती रही फिर उसने अचानक कहा- बस बहुत हो गया, अब और सहन नहीं होता।

मैंने उसे सीधा करके लेटा कर अपने लंड महाराज को उसकी चूत पर रखा और हल्का सा अंदर डालने की कोशिश की। जैसे ही थोड़ा सा अन्दर गया, उसके मुंह से चीख निकल गई।

फिर मैंने उसे चूमना शरु कर दिया। जैसे ही मुझे लगा कि उसका दर्द कुछ कम हुआ तो मैंने एक झटका और लगा दिया और उसकी आँखों से आंसू निकलने लगे। तब मुझे एहसास हुआ कि पंकज आज तक कुंवारी है।

मैं उसे धीरे से सहला रहा था, फिर मैंने थोड़ी देर में एक और जोर का झटका लगा दिया और लंड अन्दर तक चला गया। जैसे ही लण्ड पूरा अन्दर गया वो रोने लगी और उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे। फिर मैं थोड़ी देर तक रुका ताकि उसका दर्द कम हो जाये और ऐसा ही हुआ। थोड़ी देर बाद उसे मज़ा आने लगा और वो भी चूतड उठा उठा कर मेरा साथ दे रही थी और कह रही थी- और जोर से चोदो और जोर से ! फिर न जाने कब मौका मिले इसलिए मैं आज जी भर के चुदना चाहती हूँ।

मैं उसे जोर जोर से चोद रहा था, पूरे कमरे में पच-पछ की आवाज़ आ रही थी। दस मिनट बाद वो झड़ने वाली थी तो उसने कहा- मैं तो गई !

और एकदम से ढीली हो गई।

मैं जोर लगा रहा था और पंद्रह मिनट बाद भी मैं झड़ने लगा था।

मैंने पूछा- क्या करूँ ? कहाँ छोड़ू?

उसने कहा- अंदर ही छोड़ दो जिससे मेरी चूत को शांति मिल जाये !

मैंने अंदर ही सारा माल निकाल दिया। फिर मैंने उसे रात में उसे पाँच बार चोदा, फिर हम थोड़ी देर सो गए और जैसे ही सुबह उठे तो उसने कहा- आज ऑफ़िस जाने का दिल नहीं कर रहा।

मैंने कहा- ठीक है, छुट्टी ले लेते हैं।

और मैंने और उसने ऑफिस में फ़ोन कर दिया। फिर नहा धोकर खाना खाया और फिर दिन और रात में चुदाई में लगे रहे।

दोस्तो, यह थी मेरी सच्ची कहानी !

फिर उसकी सहेलियों को मैंने कैसे चोदा वो मैं अगले भाग में लिखूंगा और अब आप सब दोस्तों की मेल का इंतज़ार करूँगा।

मुझे आप सबकि मेल का इंतज़ार रहेगा।

रामसिंह

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