भूत बंगला गांडू अड्डा-1

मेरे तन बदन में आग लगी हुई थी, बहुत दिनों से लण्ड नहीं लिया था – न मुँह में और न गांड में। मेरा साथी, मेरा बाँका चोदनहार, पूरब भी अपनी ज़िन्दगी में बिज़ी था – पहले तो उसके इम्तहान थे फिर उसके गाँव से उसके भाई भाभी आ गए। मेरे पास तो जगह कभी होती ही नहीं। मैं अपने परिवार के साथ रहता हूँ, और मेरी मम्मी गृहणी हैं, हमेशा घर में रहती हैं। मैं अपने घर अपने जानू को चुदाई के लिए बुला भी नहीं सकता।

हेल्लो… मुझे अपना परिचय पहले देना चाहिए था। मेरा नाम ऋधिम है, उन्नीस साल का गोरा चिट्टा, छरहरा लड़का हूँ, कमर अट्ठाइस इन्च है, देखने में और शरीर से भी चिकना हूँ, बी कॉम सेकण्ड इयर में हूँ।

और अब अपने हीरो के बारे में भी बता दूँ… नाम तो जान ही गए होंगे, पूरब… पूरब सिंह चौबीस साल का है, रहने वाला बहराइच ज़िले का है, लम्बाई पाँच फुट ग्यारह इंच, इकहरा बदन लेकिन मज़बूत कद काठी, लण्ड साढ़े सात इन्च और खीरे जितना मोटा। फ़ौज में जाने की प्लानिंग कर रहा है।

खैर, मुझे पूरब का लण्ड चूसे और गांड मरवाये दो महीने से ऊपर हो गए थे, मैं हवस में पागल हो गया था- इतना कि एक दिन एक जवान प्लम्बर हमारे घर काम करने आया तो मैंने उसे इतना घूरा कि वो बेचारा सकपका गया।

फिर एक दिन मैंने अपने सिंह साहब को व्हाट्सप्प पर सन्देश भेजा ‘जानू …. तुमसे मिलने का बहुत मन कर रहा है … कितने दिन हो गए!’ उधर से तीन मिनट बाद जवाब आया : कैसे हो मेरे लाल? ‘लाल का हाल बेहाल है। बताओ कब मिलोगे?’ ‘मेरे रसगुल्ले… तुम्हारे घर में तुम्हारी मम्मी हैं, मेरे घर में भी लोग हैं, कैसे मिलें?’

‘पता नहीं यार, प्लीज़ कुछ जुगाड़ करो न… बहुत मन कर रहा है।’ ‘यार मन तो मेरा भी बहुत है… मेरा लंडवा तुम्हारे लिए परेशान है।’ ‘प्लीज़ कुछ करो न…’

हम छोटे से शहर में रहते थे जहाँ हर कोई एक दूसरे को जानता था, कोई भी, कैसी भी खबर जंगल की आग की तरह फैलती थी। ‘चलो कैंट चलते हैं।’ उसने सुझाव दिया।

कैंट वैसे तो सुनसान रहता है, जँगल, झाड़ियाँ भी बहुत हैं। लेकिन अब कैंट में ये सब काम भी मुश्किल था – आतंकवादी हमलों के चलते कैंट के बहुत सारे इलाके शहरी लोगों के लिए बंद कर दिए गए थे। और अगर कहीं ये सब करते पकड़े गए तो फौजी खाल उधेड़ देते। मुझे फ़ौज के इलाकों में घुसपैठ करने वालों का हाल बहुत अच्छे से पता था।

‘नहीं यार… तुम जानते हो न की आजकल फ़ौज बहुत चौकन्नी हो गई है। पकड़े गए तो बहुत पिटाई होगी।’ मेरी बात को वो भी समझ गया ‘फिर क्या करें?’

थोड़ी देर हम दोनों शांत रहे, फिर उसका मैसेज आया ‘मैं एक जगह जानता हूँ, बिल्कुल सही… वहाँ कोई रिस्क नहीं। चलोगे?’ ‘कहाँ?’ ‘पुष्पराज सिनेमा के पास’

पुष्पराज सिनेमा हाल शहर के सिविल लाइन्स इलाके में था जो सालों पहले बंद चुका था, उसे बंद हुए कम से कम बीस साल ज़रूर हो गए होंगे, अब वहाँ बिल्कुल सन्नाटा रहता था, उसका गेट और सारे खिड़की-दरवाज़े सील कर दिए गए थे।

उसके पास लगा एक बड़ा सा कोल्ड स्टोरेज था, जिसकी वजह कुछ लोग और सामान लाने ले जाने के लिए ट्रक दिख जाते थे। और उसके पीछे जँगल था। वैसे भी सिविल लाइन्स में ज़्यादा चहल पहल नहीं होती थी, सिर्फ सरकारी दफ्तर आने जाने वाले लोग या फिर बस स्टैंड आने-जाने वाले मुसाफिर।

मैं सोच में पड़ गया ‘पुष्पराज सिनेमा? वो तो बंद पड़ा है सालों से। वहाँ क्या करेंगे?’ ‘चल कर देखो मेरे साथ।’ ‘नहीं, पहले बताओ।’ ‘यार… तुम्हारी ऐसी नौटंकी पर गुस्सा आता है।’ पूरब को गुस्सा आ गया।

वैसे यह मेरी गन्दी आदत है – फालतू बहस करने की। मेरे दोस्त भी गुस्सा करते हैं मुझ पर! ‘चुप चाप बताओ… चलोगे या नहीं? वरना बैठे रहो अपने घर…’

मैंने घुटने टेक दिए। वैसे भी मेरी हवस बेकाबू हो चुकी थी, और मुझे उस पर भरोसा भी था – मैं उसे तीन साल से जानता था।

वो अप्रैल का बुधवार था, दोपहर का समय, हम दोनों पुष्पराज सिनेमा हॉल पहुँच गए। हमेशा की तरह सन्नाटा था, उस खाली पड़े हॉल को देखकर लगता नहीं था कि कभी यहाँ भी कितनी रौनक होती थी। सड़क के उस पार गाड़ी रिपेयर करने वालों की तीन चार दुकानें थीं, उनकी ठोका पीटी के अलावा और कोई आवाज़ नहीं थी, साथ लगा कोल्ड स्टोरेज भी शान्त था।

हम दोनों गले मिले, पूरब मुझे देख मुस्कुराया ‘क्यों … रहा नहीं जा रहा?’ उसने व्यंगात्मक मुस्कान के साथ पूछा।

उसे क्या मालूम की मेरी गांड में कितनी खुजली हो रही थी। मैं उसके लण्ड की खुशबू सूँघने के लिए तरस रहा था। उसका क्या था, वो तो अपना लण्ड चुसवाता, मुझे तबीयत से गपर-गपर चोदता और फिर अपनी जवान मर्दानगी का रस मेरे शरीर में गिरा कर चल देता। ‘नहीं… तुम्हारे लिए बहुत तड़पा हूँ!’

‘चलो साथ में, एक बात ध्यान में रखो… जहाँ ले जहाँ रहा हूँ वहाँ फालतू बक-बक मत करना, बिल्कुल चुप चाप रहना। समझे?’ ‘ठीक है… जो कहोगे वही करूँगा मेरे राजा!’ ‘चुपचाप मेरे पीछे आओ – बिल्कुल चुप।’

पूरब मुझे सिनेमा हॉल के कोने में ले गया। शायद अब उस सिनेमा हॉल को पूछने वाला कोई नहीं था। बरसों पहले उसका गेट बंद करके ताला लगा दिया गया था – ताले तक में ज़ंग लग गया था। लेकिन एक कोने में उसकी बाउंडरी टूटी हुई थी – एक बड़ा सा छेद था जिससे आवारा कुत्ते आ-जा रहे थे। दीवार का छेद इतना बड़ा था कि कोई बच्चा आराम से आ-जा सकता था।

पूरब उसी छेद से नीचे झुक कर अन्दर चला गया और मुझे पीछे आने के लिए इशारा किया। एक मिनट के तो लिए मैं डर गया, लेकिन हिम्मत करके उसके पीछे अन्दर घुस गया। ‘ये… कहाँ ले जा रहे हो?’ ‘चुप भोसड़ी का ! तुमको बोला चुप रहने को।’ उसने दबी आवाज़ में डाटा। मैं घबरा कर चुप हो गया।

अन्दर घुसने के बाद, सिनेमा हॉल की सुनसान-वीरान बिल्डिंग के कोने में, जिस तरफ कोल्ड स्टोरेज था, थोड़ा अन्दर को जाकर एक पतली सी गली थी। पीछे की तरफ होने से शायद इस गली पर किसी का न ध्यान गया हो। वैसे भी वहाँ बिल्कुल सन्नाटा था- न आदमी, न आदमी का नाम-ओ-निशान। कई जगह तो झाड़ियाँ भी उग आईं थी।

हमारे दाईं तरफ सिनेमा हाल की बिल्डिंग थी, और बाईं तरफ कोल्ड स्टोरेज की ऊँची सपाट दीवार… थोड़ा अंदर जाकर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में एक सुनसान कोठरी थी – शायद यहाँ पर किसी ज़माने में जनरेटर रखा जाता हो – उसके एक झरोखे के ऊपरी हिस्से पर सालों पहले उगले गए धुंए के काले निशान अभी भी थे।

कहीं कहीं से तो हॉल की ईमारत का प्लास्टर भी उखाड़ने लगा था, लेकिन ईटों का फर्श अभी भी पुख्ता था। मैं चुपचाप पूरब के पीछे पीछे उस गली में दाखिल हो गया। मेरे अंदर डर, कौतुहल और रोमाँच की मिली जुली भावना थी। पूरब के साथ होने की वजह से मेरी हिम्मत बन गई थी, वरना वो जगह ऐसी सुनसान वीरान थी की किसी कर मर्डर कर दो तो पता न चले।

गली में थोड़ा और आगे चले तो कोल्ड स्टोरेज तो वैसा का वैसा था- वही ऊँची सपाट दीवार, और दूसरी तरफ सिनेमा हाल का बरामदा था। उसके एक कोने में एक ताला लगा दरवाज़ा था – यहाँ भी ताले-कुण्डी में ज़ंग लग चुका था। बरसो की अनदेखी वजह से कंक्रीट के बरामदे में भी झाड़ियाँ उग आई थी और छत से बड़े बड़े जालों के गुच्छे लटक रहे थे।

मेरी नज़र सहसा बरामदे में झाड़ियों में उलझे एक अखबार के पन्ने पर गई – सिर्फ चौथाई पन्ना शेष रह गया था, वो भी बिल्कुल पीला पड़ चुका था। मैंने उत्सुकतावश आगे झुक पर अखबार का टुकड़ा उठा लिया। स्थानीय अख़बार ‘जनमोर्चा’ का टुकड़ा था (जो अभी भी छपता है) , उसमें संयोग से तारीख भी सलामत थी – 12 मार्च 1984.

तब तो मेरे मम्मी पापा की शादी भी नहीं हुई थी। मैं झाड़ियों द्वारा किये गए एक पुराने अख़बार के पन्ने के सहेजने पर अचंभित था, तभी मेरा ध्यान भंग हुआ।

‘कहाँ घुस रहा है बे, चुपचाप इधर आ … चूतियापा मत कर !!’ पूरब ने हड़काया। मैं उसके पीछे पीछे भागा। ‘भोसड़ी के चुपचाप मेरे पीछे-पीछे चल!’

आगे जाकर गली खत्म थी, सामने काम ऊँचाई की एक मुँडेर थी जो थोड़ा टूट चुकी थी। हमारे अगल बगल की दोनों इमारतें समाप्त हो चुकी थी। कोल्ड स्टोरेज का पिछवाड़ा और पुष्पराज सिनेमा का पीछे का हिस्सा था – हॉल की पीछे की दीवार के साथ लगा चौड़ा सा अहाता था और जीर्ण अवस्था में ताला लगी कोठरियाँ थीं। शायद यहाँ कभी कर्मचारी या चौकीदार रहते होंगे और खुला आहाता साईकिल स्टैण्ड होता होगा।

‘लांघ जाओ!’ मुझे आदेश देकर पूरब सामने की मुण्डेर को लाँघ कर उस पार चला गया। मैं भी लाँघ कर वहाँ आ गया।

जैसा मैंने पहले बताया, उस पार जंगल था। मैंने देखा की थोड़ा दूर, झुरमुट और इमली, नीम, सेमल और बेल के घने पेड़ों के बीच एक अंग्रेज़ों के ज़माने का बंगला था। पता नहीं किसका था- शायद कोई वारिस नहीं होगा उसका।

जंगल और ऊँची इमारतों से घिरे उस बँगले पर इसी वजह से किसी का ध्यान नहीं गया था, और न तो वहाँ तक जाने के लिए ढंग का रास्ता था।

मैंने नज़रें घुमा कर देखा तो या तो इमारतों के पिछवाड़े दिखाई देते थे या फिर झाड़, झुरमुट और घने पेड़। थोड़ा दूरी पर एक छोटा सा पोखर भी था। एक दो बकरियाँ भी घूम रहीं थी।

मैं अचंभित था। मैं अपने शहर में पला, बड़ा हुआ लेकिन मुझे आज तक इस जगह का आईडिया नहीं था। और यह बगल के ज़िले के गाँव का लड़का, इसे मुझसे पहले पता चल गया!

पूरब और मैं उस बँगले की तरफ गए। कम से कम सौ साल पुराना ज़रूर रहा होगा। बाहरी दीवारों पर कई जगह से प्लास्टर उधड़ चुका था और उनपर जंगली बेल चढ़ चुकी थी। खिड़कियों के दरवाज़े टूट चुके थे, बस उनमे लगे लकड़ी के ढाँचे और काँच के टुकड़े मौजूद थे। किसी भूतों वाली फिल्म के लिए बिल्कुल सटीक भूत बँगला।

हम मुख्य बरामदे में दाखिल हुए और एक टूटे फूटे दरवाज़े से अंदर गए, एक हालनुमा कमरा आया- कभी ड्राइंग रूम हुआ करता होगा। छत से ढेर सारी बजरी गिरी पड़ी थी। एक कोने में बकरियों ने अपने छर्रे बिखेरे हुए थे। अंदर की दिवार का भी ढेर सारा प्लास्टर झड़ चुका था, उस समय की मोटी-मोटी ईंटें दिखाई दे रहीं थी। पुराने ज़माने के चीनी मिटटी के स्विच बोर्ड तारों से लटक गए थे।बीचों-बीच एक लकड़ी का एक ढांचा रखा था- शायद किसी कुर्सी या मेज़ का अवशेष हो।

मेरी हिचकिचाहट भांप कर पूरब मेरा हाथ पकड़ कर और भीतर ले गया। कुछ आवाज़ें आ रहीं थी, शायद किसी के चिल्लाने की। एक मिनट के लिए मैं डर गया। लेकिन पूरब साथ में था, इसीलिए आश्वस्त था।

हॉल से लगा एक दरवाज़ा था, जिसे हम और अंदर दाखिल हुए। एक और कमरा आया – तेज़ रोशनी से अँधेरे में आकर मेरी सिकुड़ गईं। यह शायद कभी बैडरूम हुआ करता था। इसकी भी वैसी ही हालत थी, एक कोने से तो छत तक टूट चुकी थी और धूप अंदर आ रही थी।पूरे फर्श पर छत से झड़ती बजरी गिरी हुई थी, और धूल-मिटटी की मोटी परत जमी हुई थी, हर तरफ जालों का साम्राज्य था।

एक आवारा कुत्ता हमें देख कर ठिठका और बाहर भाग गया। इस कमरे से लगा भीतर की तरफ एक और कमरा था। मैंने ध्यान दिया की सिसकारी और आहों की आवाज़ें और तेज़ हो गई थी, और ऐसा लगता था जैसे कई लोगों की आवाज़ें हों। ये आवाज़ें किसकी थीं और कहाँ से आ रही थी? यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं

पूरब मुझे उस कमरे से और भीतर ले गया। हम उस कमरे में एक कोने के दरवाज़े से और अन्दर दाखिल हुए। दरवाज़ा क्या था, लकड़ी का एक झीना पर्दा था – सालों की बरसात और बिना रख-रखाव की वजह से दीमक चाट चुकी थी। यही हाल हर खिड़की-दरवाज़े का था।

अंदर आते ही मेरे होश उड़ गए… दिल-ओ-दिमाग सुन्न हो गए… मैं कुछ सेकण्ड तक बुत बनकर खड़ा, अंदर के दृश्य को देखता रह गया। कहानी जारी रहेगी। रंगबाज़ [email protected]

कहानी का अगला भाग : भूत बंगला गांडू अड्डा-2

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