मास्टर जी का लंड चूसा

नमस्कार दोस्तो.. मैं अंश बजाज हाज़िर हूँ अपनी एक और कहानी लेकर.. अंतर्वासना का मैं आभारी हूँ कि लेखकों की भरमार होते हुए भी आप तक मेरी कहानियाँ समय पर पहुंच रही हैं और आपका भी आभारी हूँ कि आप मेरी कहानियों को पसंद कर रहे हैं..

हो सकता है कि किसी कहानी में आपको ज्यादा मज़ा न आए क्योंकि मेरे साथ घटना जैसे घटी होती है उसको मैं वैसे ही लिखता हूँ और इसलिए हर कहानी अलग होती है और उसका रोमांच निर्भर करता है घटना किन परिस्थितियों में घटी और कैसे घटी…

तो आपका ज्यादा समय न लेते हुए मैं अपनी कहानी शुरू करता हूँ..

बात तब की है जब मैं 12वीं कक्षा में पढ़ता था। मर्दों के प्रति मेरा आकर्षण बढ़ता जा रहा था क्योंकि मैं भी अपनी जवानी में कदम रख चुका था और लड़कों की पैंट की चेन पर बने उभार को देखने में बहुत मज़ा आता था क्योंकि वहाँ पर अंडरवियर के अंदर उनका लंड होता था जिससे चेन ऊपर उठ जाती थी और उस उभार को देखकर अक्सर मैं यह अंदाज़ा लगा लिया करता था कि सामने वाले का हथियार कितना बड़ा हो सकता है।

तो इसी तरह मेरी नज़र हमारे गणित के मास्टर हरि ओम पर रहती थी.. वो उम्र में करीब 30-32 साल के थे और देखने में ठीक ठाक लगते थे लेकिन हमेशा दाढ़ी और मूंछें रखते थे और उनकी शर्ट में से उनके छाती के बाल भी दिखाई देते रहते थे।

प्लेट्स वाली फॉर्मल पैंट पर साधारण सी शर्ट पहनते थे और बाजू कोहनियों तक चढ़ी रहती थी जिसके कारण उनके बालों से भरे मजबूत मर्दाना हाथ भी नज़र आते रहते थे और उनकी मर्दानगी का अहसास कराते रहते थे।

जब उनका पीरियड आता था मेरी नज़र ज्यादातर उनकी फॉर्मल पैंट की चेन के उभार का जायज़ा लेती रहती थी और मैं उनके लंड की पोजिशन का पता लगाने के चक्कर में ब्लैक बोर्ड पर देखने की बजाय उनके लंड की तरफ देखता रहता था।

ब्लैक बोर्ड पर सवाल समझाते हुए जब वो एक तरफ से दूसरी तरफ जाते थे तो चलते हुए उनके लंड की पोजिशन का पता लग जाता था और मैं उस नज़ारे का खूब आनन्द लेता था।

कॉपी चैक कराने जब उनकी टेबल के पास जाता तो ऊपर से तब भी चोरी छुपे उनकी शर्ट में से उनकी बालों से भरी छाती को देखता था और कई बार तो बनियान में कसे उनके निप्पल भी दिख जाते थे।

उनकी छाती काफी शेप में थी और पेट भी सपाट था जिससे उनकी छाती और बाहर की तरफ निकली हुई दिखती थी। कई बार जब अगले डेस्क पर उनके सामने बैठता तब भी टेबल के नीचे से उनके जांघों के बीच में उभरे उनके लंड को देखता रहता था।

कई बार तो वो कॉपी चैक करते हुए जब मेरे डेस्क के पास आकर खड़े होते तो उनकी पैंट की चेन के उभार और मेरे होठों के बीच ज़रा सा फासला रह जाता.

. मन करता कि यहीं मुँह रख दूँ उनके लंड पर और चूस लूँ इसे!

ऐसे ही देखा देखी में सारा साल बीत गया और फाइनल एग्जाम्स की डेट्स आ गईं। सभी अध्यापकों ने कहा कि जिन बच्चों को जो भी सवाल पूछने हैं एग्जाम से पहले पूछ लें इसके बाद फिर एग्जाम शुरु हो जाएंगे।

सवाल तो मेरा भी था लेकिन गणित का नहीं.. हरिओम के लंड का.. कि कितना बड़ा और मोटा होगा.. और इसका जवाब ढूंढने के लिए मैं दिमाग दौड़ाने लगा कि कैसे उसको उसको उकसाऊँ और उसका लंड देखने का मौका मिले।

फिर एक दिन जब उनका सबसे आखिरी का पीरियड था तो मैंने हिम्मत करके उनसे कहा कि सर मेरा एक सवाल है क्या आप मुझे छुट्टी के बाद बता सकते हैं?

वो बोले- ठीक है, मैं छुट्टी के बाद 10 मिनट तक रुक जाऊँगा। मैं खुशी खुशी जाकर बैंच पर बैठ गया लेकिन साथ ही घबरा भी रहा था कि क्या करूँगा और कैसे करूँगा.. कहीं गुस्सा होकर मुझे पीटने न लग जाएँ.. लेकिन मैंने सोचा कि अब तो रोक लिया है इसको सवाल के बहाने और ये मौका फिर नहीं मिलेगा.. तो मैं छुट्टी होने का इंतजार करने लगा।

15 मिनट बाद छुट्टी हो गई और सारे बच्चे क्लास से जाने लगे.. और यह क्या हरिओम सर भी उठकर जाने लगे.. मैंने देर न करते हुए बैंच पर बैठे बैठे ही उनको आवाज़ लगाई- सर रुकिए.. मेरा एक सवाल था जो आपसे पूछना था!

‘अरे हाँ अंश.. मैं तो भूल ही गया बेटा… बताओ कौन सा सवाल है?’ कहते हुए मेरे डेस्क के पास आकर खड़े हो गए। उन्होंने ग्रे रंग की पैंट पहनी हुई थी जिसमें बहुत बारीक सफेद चैक बना हुआ था और उसकी चेन का उभार में उनका लंड डेस्क पर रखे मेरे बैग से आकर सट रहा था।

मेरी नज़र उनके लंड पर बार बार जा रही थी। उन्होंने फिर पूछा- कौन सा सवाल है अंश? मैंने सवाल पहले से ही सोच रखा था, मैंने कॉपी खोल कर सवाल दिखा दिया।

देखकर वो समझाने लगे, उनका बांया हाथ कमर के पीछे लगा हुआ उनकी मोटी गांड पर रखा हुआ था और दाहिने हाथ में वो पेन लेकर सवाल समझा रहे थे।

मैंने कॉपी बैग पर इस तरह रखी कि पैंट की चेन के उसके उभार तक पहुंच रही थी और जहाँ से वो उभार को टच करने को हो रही थी। वहाँ से उसे मैंने अपने हाथ से संभाल रखा था और इस तरह मेरे हाथ का ऊपर वाला हिस्सा उसकी जिप को टच कर रहा था और मैं बहाने से उसके लंड को छूने की कोशिश कर रहा था।

ऐसा करते करते एक दो बार लंड मेरे हाथ को छू गया और मेरी वासना तेज़ हुई और हिम्मत भी थोड़ी बढ़ गई लेकिन हरिओम सर ने मेरी इस हरकत पर ध्यान नहीं दिया शायद…

अब मैंने उंगलियों की हरकत भी शुरु कर दी और अपनी उंगलियों के बीच में उसके लंड को फंसाने की कोशिश करने लगा लेकिन जल्दी ही सवाल खत्म हो गया और उन्होंने पूछा- आ गया सवाल समझ?

मैंने कुछ ना समझते हुए भी कह दिया- हाँ सर, आ गया.
. यह कह कर वो जाने लगे.. अब क्या करूँ? ये तो जा रहे हैं.. मैंने झुंझलाते हुए सर को फिर आवाज़ दी- सर एक मिनट..

वो बोले- अब क्या हुआ? ‘सर कोई हिंट दे दो एग्जाम के लिए.. ताकि अच्छे नंबर ले आऊं?’ ‘बेटा मेहनत कर.. यही हिंट है!’ ‘ठीक है सर..’ कहते हुए मैं झुककर उनके पैर छूने लगा कि कम से कम आखिरी बार उनके लंड के उभार को करीब से देख लूँ।

लेकिन किस्मत से मेरी शर्ट की जेब में कुछ खुले सिक्के और दो पेन थे जो झुकते ही नीचे उसके जूतों के बीच में गिर गए।

बस अब मैंने इसका फायदा उठाने की ठान ली… मैं घुटनों पर बैठकर सिक्के उठाता हुआ उनके लंड की तरफ देखने लगा जो मेरी नाक से महज 2 इंच की दूरी पर था।

सिक्के उठाते हुए मैंने सिर आगे पीछे करने के बहाने उसके उभार को दो बार चूम लिया और मेरे अंदर वासना की आग भड़कनेलगी।

अब पेन उठाते हुए मैंने उनकी पैंट के उभार पर मुंह रख दिया और उनकी गांड को हाथों से दबाते हुए मुंह से उनके लंड को चूमने लगा।

वो एकदम मुझे दूर हटाते हुए पीछे खिसके, दरवाजा के पीछे होने की वजह से वो बंद हो गया। वे गुस्से से बोले- अबे क्या कर रहा है?

मैंने फिर उनकी जिप में मुंह दे दिया और बेतहाशा चूमने लगा। ‘अंश। पागल हो गया है? क्या कर रहा है ये?’ ‘सर, प्लीज मना मत करो! मुझे आपका लंड चूसना है..’ कहते हुए मैंने हाथों से उनकी गांड को पकड़ते हुए फिर पैंट में मुंह दे दिया। ‘लेकिन ये..’

मैं उनकी चेन पर जोर जोर से हाथ फिराने लगा। ‘अरे सुन…’

मैंने उनके लंड को पैंट पर से ही मसलना शुरु कर दिया और हाथ में लेकर दबाने लगा। ‘मान जा अंश.. ये ठीक नहीं है!’

मैंने उनकी चेन को खोल कर हाथ अंदर दे दिया और अंडरवियर के ऊपर से लंड को हाथ में पकड़कर सहलाने लगा। उनका लंड खड़ा होने लगा था.. मैंने पूरे हाथ से लंड और आंड दोनों को कवर करते हुए अंडरवियर में दबा दिया और वो जाकर दरवाजे के सहारे जाकर लग गए।

वो मुझे पीछे हटाने लगे लेकिन तब तक मैंने उनकी पैंट का हुक खोलकर उसे नीचे सरका दिया और उनके अंडरवियर में उनके आधे तनाव में आ चुके लंड को चूमने चाटने लगा और अंडरवियर को एक मिनट तक चाटते रहने के साथ ही अपने आप उनके हाथ मेरे सिर पर आकर मेरे मुंह को अंडरवियर में घुसाने लगे।

लौड़ा पूरा तन चुका था और अंडर वियर में किसी रॉड की तरह कड़ा होकर उछाले मार रहा था। मैं देर न करते हुए उनके अंडरवियर को थोडा़ सा नीचे सरका कर उनकी झाटों में मुंह देकर चूमने लगा.
. और अगले ही पल उन्होंने अपना अंडरवियर घुटनों तक पैंट सरकाते हुए नीचे कर दिय़ा और अपना 6.5 इंच का लौड़ा मेरे मुंह में दे दिया।

मैं भूखे कुत्ते की तरह उनके लंड को खाने लगा.. कभी आंड चूमता, कभी लंड की टोपी की टोपी पर जीभ फिराता और लॉलीपोप की तरह चूसने लगता! और अगले ही पल पूरा अंदर गले तक ले जाकर जीभ से चूस डालता।

वो अब अपनी गांड हिलाते हुए मेरे मुंह में धक्के मारने लगे.. उनके मुंह से आह आह की आवाज निकलने लगी और सिसकारियाँ लेने लगे- ओह अंश चूस जा इसको पूरा.. आह चूस इसे ..बहुत दिनों से नहीं चुसवाया था.. और जोर से चूस यार!

मैं भी आंख बंद करके उनके लंड को मस्ती में चूसे जा रहा था।

दरवाजे से लगे हुए उनकी आँखें बंद हो चुकी थीं और वो लंड चुसवाने का मज़ा ले रहे थे।

दो मिनट तक तबीयत से मैंने लंड को चूसा.. अब एकदम से उन्होंने मुझे उठाया और मेरी पेंट की बेल्ट खोलने लगे।

मैं घबराया- सर ये क्या रहे हो? ‘अब तूने लौड़े को गर्म कर दिया है.. तो तेरे छेद में डालकर इसको ठंडा भी तो करना है..’

‘लेकिन सर मैंने कभी गांड नहीं मरवाई!’ ‘तो आज मरवा ले मेरी जान.. आज तो तेरी गांड में अपना लौड़ा उतार कर रहूँगा!’ कहते हुए उन्होंने मेरी बेल्ट खोलकर पैंट नीचे उतार दी और जांघिया को भी उतार कर नीचे कर दिया।

वो एक हाथ से मेरे नरम नरम गोरे चूतड़ों को दबा रहे थे तो दूसरे हाथ से मेरी छोटी छोटी निप्पलों को जोर से मसलने लगे। मैं तड़प गया- सर छोड़ दो! ‘हाँ, तेरी गांड में ही छोडूंगा!’ ‘सर जाने दो प्लीज़!’ ‘नहीं मेरी जान..’ कहकर वे मेरी गांड पर अपना लंड लगाकर रगड़ने लगे।

वो धक्का मारने ही वाले थे कि तभी हमें चपरासी की आवाज़ सुनाई दी- कोई है क्या अंदर? हमारी हवा निकल गई.. मैंने सर से अलग होते हुए फटाफट पैंट ऊपर बांधी और बैग की तरफ लपका।

तब तक सर ने भी अपनी पैंट बांध ली थी और दरवाजा खोलते हुए बाहर निकलकर बोले- हाँ भाई.. हम लोग थे अभी बच्चे को एक सवाल सिखा रहा था… कहकर वो खिड़की में से मुझे झंझलाते हुए देखकर निकल गए।

मैं भी खैर मनाता हुआ कमरे से निकला और फटाफट स्कूल के गेट के बाहर..

बस उसके बाद एग्ज़ाम शुरु हो गए और उसके बाद कॉलेज में दाखिला ले लिया।

उस दिन तो गांड मरते मरते बची मेरी..

कहानी पर अपनी राय जरूर दें! मैं अंश बजाज जल्दी ही लौटूँगा अगली कहानी के साथ! [email protected]

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