मुझे जीना सिखा दिया-2

मेरे अन्‍दर भी खून का दौरा तेज हो गया, हम दोनों तो एक दूसरे से ऐसे लिपटे कि दुनिया जहान की खबर ही नहीं रही। होंठ छूटते ही मैंने शशि पूरे चेहरे को चूमना शुरू कर दिया।

तभी शशि की निगाह विवेक और काजल पर गई, वे दोनों भी तो दुनिया को भुलाकर एक दूसरे से लिपटे हुए थे। शशि ने मुझे नजरों से इशारा किया, मैंने उन दोनों को देखा फिर शशि की तरफ देखकर मुस्‍कुराया।

शशि ने एकपल को मुझसे छूटकर चारों तरफ निगाह दौड़ाई, दूर दूर तक हम चारों के अलावा कोई दिखाई नहीं दे रहा था। शशि पुन: मुझसे लिपट गई।

इस बार शशि ने बाहें फैलाकर खुद मुझे जकड़ लिया और अपने दहकते होठों को मेरे होठों पर रख दिया। अब मैं बारिश में भीगकर भी कामाग्नि में तपने लगा, कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, कुछ भी पता नहीं था, बस बाहों में एक सुन्‍दरी थी इसके और मैं उस पर के आनन्‍द को जन्‍नत महसूस कर रहा था।

मुझे पता भी नहीं चला कब मेरे हाथ शशि की कामुक गोलाइयों पर थिरकने लगा, शशि के कड़े हो चुके चूचुक का अहसास मुझे होने लगा। मेरे पूरे बदन में चींटियाँ सी दौड़ रही थी, मेरे अन्‍दर खून की गर्मी बढ़ती गई।

बारिश के बावजूद मेरा पूरा बदन तप रहा था। शशि के बदन की गर्मी भी मैं महसूस करने लगा। मेरे हाथ शशि के बदन के हर कटाव को ऊपर से नीचे तक नापने लगे।

अचानक होश तब आया तब शशि का एक हाथ मेरी पैंट के अगले हिस्‍से के ऊपर आया। मैंने भी सबसे पहले घूमकर विवेक और काजल की तरफ देखा वो दोनों भी मस्‍ती से लगे थे पर इस समय उनकी निगाहें हमारी तरफ ही थी। नजरें मिलते ही विवेक मुस्‍कुराया पर काजल ने मेरी तरफ शरारती ढंग से आँख मारी।

मैंने खुद को नियंत्रित किया और शशि को भी इशारा किया।

हम दोनों थोड़ी दूरी पर ही प्रेमालाप कर रहे विवेक-काजल की तरफ बढ़ गये।

मैंने कहा- यार बेहतरीन वाला मूड बन रहा है, जल्‍दी से होटल चलो। ‘क्‍यों जी, यहाँ ये काम नहीं करेगा क्‍या?’ कहते हुए अचानक काजल ने मेरी पैंट के ऊपर से ही पूरी तरह से टाइट हो चुके लिंग पर हाथ मारा!

और हम चारों हंस दिये।

‘वाह बेटा! तुम्‍हें देखकर ही तो हमारा मूड बना और तुम ही अब मैदान छोड़ कर भाग रहे हो?’ विवेक बोला।

तभी काजल ने वो किया जिसकी शायद वहाँ किसी को भी उम्‍मीद नहीं थी… काजल ने अचानक हाथ बढ़ाकर शशि की मिड्डी के ऊपर से ही उसकी योनि को पकड़ते हुए कहा- मैडम यहाँ आग नहीं लगी क्‍या? ‘बहुत लगी है चींटियाँ दौड़ रही हैं।’ बोलकर शशि ने नजरें झुका ली।

हालांकि मुझे शशि से ऐसे जवाब की उम्‍मीद नहीं थी पर आज उसके इस साहसी कामुक अवतार को देखकर मैं जितना खुश था, उतना ही अचंभित भी।

‘तो होटल जाने तक अब मुझसे इंतजार नहीं होगा।’ बोलकर काजल ने विवेक पुन: विवेक को अपनी तरफ खींच लिया, और वो दोनों फिर से एक दूसरे में मग्‍न हो गये। हम तो बस उधर देख ही रहे थे कि काजल घुटनों के बल बैठकर विवेक के लिंग को पैंट के ऊपर से ही चाटने लगी। मैंने जीवन में कभी इतनी कामुक औरत नहीं देखी थी।

मैंने पुन: शशि को दबोच लिया। इस बार हम दोनों का ध्‍यान जितना एक दूसरे में था उतना ही पास में व्‍यस्‍त विवेक-काजल में भी। काजल तो जैसे दीन-दुनिया से बेखबर हो गई, उसने विवेक की पैंट की चेन खोलकर अन्‍दर हाथ डाला और उसके पूरी तरह कड़क हो चुके लिंग को बाहर निकालकर अपने मुंह में भर लिया।

अब मुझसे बर्दाश्‍त नहीं हो रहा था, मेरा कामांग भी पैंट फाड़ कर बाहर निकलने फड़फड़ा रहा था, मैंने भी शशि की हाथ पकड़ कर पैंट के ऊपर ही अपने लिंग पर रख दिया।

शशि तो अब खड़े होने की स्थिति में भी नहीं थी, वो पास में पडी एक बैंच पर बैठ गई, और मेरे ऊपर से ही मेरे लिंग को पकड़ कर सहलाने लगी।

तभी उधर से हंसी की आवाज आई। हमने घूमकर देखा तो विवेक और काजल हमारी हालत देखकर हंस रहे थे। काजल विवेक का पूरी तरह से लौह हो चुका कामांग सहला रही थी।

मैंने पूछा- क्‍या हुआ? हंस क्‍यों रहे हो? इतना ही बोलना था कि काजल वहाँ से उठकर हमारे पास आई, और शशि के दोनों बहुत ही खूबसूरत उरोजों को अपने हाथों में समेटते हुए बहुत ही कामुक अंदाज में पूछा- मजा आ रहा है क्‍या?

‘हम्‍म्‍म्‍म… म्‍म्‍म’ गहरी सांस के साथ बस इतना ही निकला शशि के मुंह से।

‘तो श‍रमाना कैसा?’ कहते हुए काजल ने मेरी तरफ मुंह किया और मेरी पैंट की जिप खोल कर अपना हाथ अन्‍दर सरका दिया। ‘ईस्‍स्‍स्‍स स्‍स्‍स्‍स्‍स स्‍स्‍स…’ मेरे मुंह से सीत्‍कार निकली। यह क्‍या कर दिया जालिम ने!

अभी मैं कुछ समझ पाता कि काजल ने मेरी बांसुरी पैंट से बाहर निकाल कर शशि के मुंह की तरफ सरका दी।

न जाने आज क्‍या क्‍या होने वाला था! शशि तो जैसे इसी इंतजार में थी, उसने तुरन्‍त मुंह खोला और पूरा का पूरा लिंग अन्‍दर सरका लिया।

अब तो शशि भी बारिश में इस नये आनन्‍द का अनुभव करने को बेकरार लगने लगी।

विवेक भी चलकर मेरे बराबर में आ गया, काजल ने तुरन्‍त किसी शिकारी नेवले की तरह विवेक के काले नाम को अपने मुंह में ले लिया और आनन्‍द लेने लगी।

काजल और शशि दोनों बैंच पर बैठकर हम दोनों की बांसुरी पूरे आनन्‍द से बजाने लगी। उफ्फ… क्‍या आनन्‍द था। ये सब किसी ख्‍वाब के सच होने जैसा लग रहा था, इतना आनन्‍द तो कभी जीवन में नहीं लिया जितना आज इस बाग में मिल रहा था!

हम दोनों पुरूष तो इन महिलाओं के सामने बिल्‍कुल बेबस हो गये। पर आनन्‍द इतना जिसको बयान करना मुश्‍किल।

तभी विवेक ने काजल की कमीज के बटन खोल दिये। हाय रेऽऽऽ… मैं कैसे बयान करूँ!

काले रंग की अंगिया में छुपे हई गोरे रंग की वो ब बड़ी पहाड़ियाँ और ऊपर से गिरती बारिश के पानी की बूंदें… जो माहौल उस समय था उसको शब्‍दों में तो बयान नहीं किया जा सकता दोस्‍तो, बस महसूस ही किया जा सकता है।

मेरे बाईं ओर खड़े विवेक ने काजल के दायें स्‍तन को ब्रा के ऊपर से ही सहलाना शुरू कर दिया। देखकर मुझे भी सुरूर आने लगा।

तभी आवाज आई- ईस्‍स्‍स् स्‍स्‍स्‍स स्‍स्स्‍स्‍स…यह तो शशि की सीत्‍कार थी।

मैंने नीचे देखा तो पाया विवेक दूसरे ने अपना दांया हाथ शशि की मिड्डी के अन्‍दर सरकाकर उसका भी एक स्‍तन सहलाना शुरू कर दिया। शशि तो आँखें बंद करके उस नशीले माहौल का पूरा मजा ले रही थी।

जब मेरे लिये खुद को रोक पाना मुश्किल होने लगा तो मैंने अपना लिंग शशि के मुंह से निकाला और वहीं नीचे बैठकर सामने बैठी शशि की मिड्डी ऊपर सरकानी शुरू कर दी। शशि को जैसा एक पल को होश आया हो।

उसने आँखें खोलकर चारों तरफ का जायजा लिया और बिल्‍कुल सुनसान माहौल देखकर फिर से आँखें बन्‍द कर ली। मैंने भी शशि की मिड्डी थोड़ी ऊपर सरकाकर उसकी गोरी गुदाज जांघों को ऊपर तक चाटना शुरू कर दिया।

ऐसा करने में जैसे ही मैंने अपना एक हाथ शशि और काजल के बीच में बैंच पर रखा, काजल ने अपनी स्‍कर्ट ऊपर करके मेरा हाथ पकड़कर अपनी जांघ पर रख दिया।

वाह… दो चिकनी चिकनी जांघें एक साथ… एक का रस सीधे मुंह में जा रहा था और दूसरी का मजा मेरी उंगलियाँ ले रही थी।

शशि तो पूरी तरह से निढाल हो गई, ऐसा लगा जैसा शशि को वो नैसर्गिक सुख मिल गया है जिसकी तलाश उस समय हम चारों को थी, उसने कहा- जल्‍दी से होटल चलो, बस टैक्सी में बैठो और चलो।

बोलकर शशि ने मुझे और विवेक को पीछे सरकाया और अपने पूरी तरह से भीग चुके अपने कपड़ों को ठीक सा करते हुए बाहर की तरफ भागी।

अब तो हम तीनों को भी उसके पीछे भागना ही था तो हमने भी बिना किसी सवाल जवाब के अपने अपने कपड़े ठीक किया और बाहर टैक्‍सी की तरफ चल दिये।

घड़ी में 7.

50 हो चुके थे, बाकी सब जा चुके थे, बाहर टैक्‍सी ड्राइवर हमारा ही इंतजार कर रहा था।

टैक्‍सी वाले ने 30 मिनट में ही हमें होटल में पहुँचा दिया। तब तक हम चारों का वो जुनून कुछ हद तक शांत को चुका था। बहुत थकान भी महसूस होने लगी।

अब हम सब ने फ्रैश होकर पहले कुछ खाना ही बेहतर समझा। हम चारों अपने अपने कमरे में गये, और अपने गीले कपड़े बदले, नहाकर साफ सुथरे लेकिन नाईट सूट ही पहनना बेहतर समझा, चेंज करके विवेक और मैंने तो सिर्फ बरमूडा ही पहना। पर ये दोनों कातिल हसीनायें हमें यहाँ भी मात दे गई, गुलाबी रंग की पारदर्शी नाईटी में काजल और हल्‍के नीले रंग के सैटिन के कामुक नाईट सूट में शशि जैसे उस रात को हम दोनों पुरूषों के सब्र का इम्‍तहान लेने पर आतुर थीं।

मैंने जल्‍दी से खाना आर्डर किया। खा-पीकर विवेक ने अपने बैग से ताश निकाल ली और हम चारों रम्‍मी खेलने लगे।

हम लोग कुछ ही देर आराम से खेल पाये थे कि मुझे फिर से बेचैनी होने लगी। मुझे पता था कि शशि तो एक बार संतुष्‍ट हो चुकी है पर मुझ पर तो अभी खुमारी बाकी थी। वैसे भी आज पहली बार शशि मुझे किसी अप्‍सरा से कम नहीं लग रही थी।

मैंने नजरों ही नजरों में शशि को अपने कमरे में चलने का इशारा किया। चाल खत्‍म होते ही शशि ने पत्‍ते रखे और अपने कमरे में चलने के लिये खड़ी हो गई। उसके उठते ही मैंने भी सबको शुभरात्रि बोला और अपने कमरे की ओर बढ़ गया।

‘अरे एकदम अचानक, क्‍या हुआ?’ काजल ने पूछा। ‘बहुत थक गये हैं यार, अब नींद आ रही है।’ शशि ने जवाब दिया।

‘हा हा हा हा…’ हंसते हुए वि‍वेक बोला- अरे स्‍वीटहार्ट, हमें पता है तुम्‍हारी नींद का, चुपचाप यहीं बैठ जाओ, कहीं नहीं जाना। ‘अब मूड खराब मत करो यार, मौसम भी है मौका भी, मस्‍तानी रात भी, कुछ तो फायदा उठाने दो।’ मैंने विवेक को आँख मारते हुए कहा। ‘अब हमसे क्‍या शर्माना? जो भी फायदा उठाना है यहीं उठाना। तुम हमारे सामने और हम तुम्‍हारे सामने।’ विवेक ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा।

‘जी नहीं, कुछ शर्म करो। वहाँ बाग में जो हुआ वो बस नशे में हो गया। अब हमें अपने कमरे में जाने दो।’ शशि ने जवाब दिया।

पर मुझे जैसे विवेक की बात कुछ जंच सी गई, या यूं कहूँ कि मेरे अन्‍दर अब नई शरारत हिलौरे मारने लगी, मैंने भी शशि से वहाँ ही रूकने का अनुरोध किया।

शशि ने मुस्‍कुराते हुए मेरी तरफ देखा और बोली- सुधर जाओ ! चुपचाप अपने कमरे में चलो, वरना मैं तो चली।’ मैंने सोचा थोड़ी कोशिश किये बिना भी हार मानना ठीक नहीं… मैंने शशि से दुबारा वहीं रूकने का अनुरोध किया। थोड़ी देर ना-नुकुर करने के बाद शशि वहाँ उसी कमरे में रूकने को राजी हो गई।

तभी अचानक फोन शशि के मोबाइल पर बेटे का कॉल आ गया। शशि उससे बात करने के लिये उस कमरे से निकलकर बराबर में सटे अपने कमरे में चली गई।

शशि के जाते ही मैंने विवेक से कहा- वैसे तो मैं शशि को इसी कमरे में लाने का प्रयास करूँगा, परन्‍तु यदि न आ पाई तो मेरे कमरे का दरवाजा कभी भी तुम्‍हारे लिये खुला होगा। जब भी आना चाहो, स्‍वागत है। और विवेक की तरफ आँख मारकर मैंने भी विवेक से वापस दरवाजा खोलकर रखने को बोलकर जल्‍दी ही वापस आने का वादा किया, और शशि के पीछे-पीछे अपने कमरे में चला आया।

कमरे में आकर हम दोनों ने तसल्‍ली से बच्‍चों से बात की। बातचीत के बाद मैंने अपने ही कमरे में रहकर सही माहौल बनाना ठीक समझा, मैं किसी भी प्रकार की जल्‍दबाजी का पक्षधर नहीं था परन्‍तु ज्‍यादा देर करना भी तो मूर्खता का परिचायक था।

फोन से फ्री होने के बाद तुरन्‍त मैंने अपने कमरे में ही शशि को अपने बिस्‍तर पर खींच लिया। एक तो शाम को बाग वाला नशा दिमाग से अभी तक उतरा नहीं था, ऊपर से उसकी कामुक वेशभूषा मुझे पागल कर रही थी।

बिस्‍तर पर आते ही शशि धड़ाम से मेरे ऊपर ही आ कर गिरी, मैंने शशि को अपने बाहुपाश में कस लिया और उसके चेहरे पर चुम्‍बनों की बारिश शुरू कर दी। शशि भी मेरा पूरा साथ देने लगी।

पूरी तरह से मेरे ऊपर लेटी शशि ने अपनी बारीक लम्‍बी अंगुलियों को मेरे बालों में फिराना शुरू कर दिया। मेरे हाथ शशि की कमर के निकले भाग से नितम्‍बों तक उसको सहलाने लगे। मेरी नजरें तो शशि की नजरों में ही डूबी हुई थी। हम दोनों एक दूसरे में ऐसे खोये कि हमें भान ही नहीं रहा कि कब बराबर के कमरे से विवेक और काजल हमारे कमरे में आकर हमारी कामक्रीड़ा का दर्शन लाभ लेने लगे।

अचानक मेरी निगाह काजल पर पड़ी जो कुछ दूरी पर खड़ी हम दोनों को बहुत ही प्‍यासी नजरों से निहार रही थी। अरे यह क्‍या… काजल के पीछे ही विवेक भी तो खड़ा था। विवेक काजल के पीछे से चिपक कर खड़ा दोनों बाहों में काजल को दबाये उसके दोनों उरोजों को सहला रहा था।

नजरें मिलते ही विवेक ने मुझे आँख मारी। मैंने काजल की तरफ देखा, काजल हम दोनों को देखकर मुस्‍कुरा रही थी।

मैंने भी उस समय उन दोनों को नजरंदाज करना ही उचित समझा और अपना काम चालू रखा। अचानक से मेरी उत्‍तेजना बढ़ने लगी, अब मैं शशि की भी टोह लेना चाहता था, मैंने शशि से पूछा- सुनो! ‘हम्‍म…’ शशि हुंकारी। ‘तुम्‍हें विवेक और काजल कैसे लगे?’ मैंने शशि के कान में हौले से पूछा। ‘अच्‍छे हैं दोनों मिलनसार भी हैं।’ शशि ने कहा।

‘और विवेक बहुत हैण्‍डसम भी है ना!’ मैंने फिर से शशि को टटोला। ‘और काजल बहुत सैक्‍सी भी है ना!’ शशि मेरी नजरों में देखकर मुस्‍कुराई।

‘चलो, उनके कमरे में ही चलते हैं।’ मैंने कहा। ‘अरे रहने दो ना… वो दोनों लगे होंगे! अब उनको क्‍यों डिस्‍टर्ब करते हो।’ शशि ने जवाब दिया। ‘हो सकता है वो दोनों हमारा इंतजार कर रहे हों?’ मैंने फिर से कहा। ‘रहने दो ना, पता नहीं वो हमारे बारे में क्‍या सोचेंगें।’ शशि ने उत्‍तर दिया।

‘अच्‍छा एक बात बताओ?’ मैंने पुन: शशि पर प्रश्‍न दागा। शशि- पूछो। ‘बाग में इस तरह अपने सामने ही किसी दूसरे जोड़े तो कामावस्‍था में अच्‍छा लग रहा था ना?’ ‘हम्‍म्‍म्‍म्‍म… बहुत ही मजेदार। पर अब सोचकर भी शर्म आ जाती है।’ शशि ने निस्‍संकोच कहना जारी रखा- सच कहूँ तो उस समय मुझे भी होश नहीं था, बहुत ही उत्‍तेजक लग रहा था, मजा भी आ रहा था पर अब शर्म महसूस हो रही है।

‘अच्‍छा जी, अब हमसे शर्माना कैसा?’ अचानक बराबर में खड़ी काजल से शशि की चुटकी काटते हुए कहा। शशि ने पलटकर उन दोनों की ओर देखा तो नजरें नीची कर मेरी छाती में गड़ती सी जाने लगी। अब तो शशि को उन दोनों के आने का पता चल ही चुका था तो मैंने भी मौके की नजाकत को समझते हुए विवेक से कहा- विवेक भाई हमें तो बस एक ही बिस्‍तर काफी है तुम चाहो तो दूसरा बिस्‍तर कब्‍जा सकते हो।

काजल तो जैसे इसी अवसर की प्रतीक्षा में थी, एकदम कूदकर बराबर वाले बिस्‍तर में आ गई। कूदने से काजल की नाईटी काफी ऊपर तक उठी उसकी गोरी चिकनी जांघें देखकर ही मेरा तो जी गले में आ गया।

काजल ने भी जैसे मेरी इस हरकत को भांप लिया था, बराबर में लेटते ही दोनों टांगें ऊपर की तरफ उठा दी, अब तो उसकी पूरी नाईटी ही पेट पर आ गिरी। पैरों के नाखून से लेकर गुलाबी रंग की पैंटी तक बिल्‍कुल करीने से संरचित टांगें मेरे खून को और गर्मी देने लगी।

मेरी तरफ देखकर मुझे चिढ़ाते हुए काजल बोली- उधर ध्‍यान दो मिस्‍टर! मैंने अकबका कर शशि की तरफ देखा। पर वो तो शायद होश में ही नहीं थी, बस बेतहाशा मेरे बदन को चाटे जा रही थी। पर मेरा ध्‍यान अब दो जगह भटकने लगा।

अब तक विवेक काजल के पास आ चुका था, उसने आते ही काजल का नाईटी को ऊपर सरकाकर उसकी केले के तने जैसी चिकनी टांगों को चाटना शुरू कर दिया। विवेक ने काजल के पैर के अगूठे को अपने मुंह में भर लिया, और उसको चूसने लगा, दोनों हाथों से काजल की जांघों को सहलाने लगा। काजल का मुंह बिल्‍कुल मेरे पास था। उफ्फ्फ्फ्फ्फ…काजल की सीत्कार मुझे पागल करने लगी, मैंने अपने हाथों की उंगलियों को शशि के पजामे में फंसाते हुए उसको नीचे की तरफ सरका दिया क्‍योंकि मैं जानता था कि शशि जाघों से बहुत संवेदनशील है, और वहाँ हाथ लगाते ही शशि अतिउत्‍तेजित हो जाती है। वैसे भी शशि की गुदाज मखमली जाघें देखकर तो मैं खुद भी नियंत्रण से बाहर हो जाता हूँ।

‘हक्‍क्‍क्‍क्‍क्‍क…’ ऐसा लगा जैसे शशि के गले में कुछ फंस गया है। मैंने शशि को प्‍यार से काजल के बगल में लिटाने को करवट ली तो देखा कि काजल की जांघों पर तो विवेक का एक हाथ बहुत ही नाजुक अंदाज में थिरक रहा था।

अब समझ में आया कि शशि के गले में क्‍या फंसा था। मैं शशि को लिटाकर तुरन्‍त उसके उसके बराबर में आ गया। अब काजल और शशि बराबर-बराबर में लेटी थी, मैं शशि के दूसरी ओर था। पर विवेक उन दोनों की टांगों के बीच फंसा था।

हालांकि शशि की आँखें बन्‍द थी, परन्‍तु उसको मिलने वाले आनन्‍द की अनुभूति उसके तेजमय चेहरे को देखकर ही हो रही थी।

परन्‍तु उस समय उसके चेहरे पर जितना नूर था वो मैंने उससे पहले कभी नहीं देखा था। जबकि काजल की आँखें खुली थी और वो तो सब को देखकर पूरा मजा ले रही थी।

मैंने शशि के बराबर में लेटते ही बिना समय गंवाये उसकी कमीज के बटन खोलकर उसको ऊपर उठाकर आहिस्‍ता से उसकी कमीज निकाल दी और साथ ही पीछे से उसकी ब्रा का हुक भी खोल दिया।

कमीज और ब्रा के बीच से हटते ही मेरी नजरों के सामने वो उत्‍तेजक दृश्‍य था जिसको देखकर ही मैं पागल होने लगा। शशि के दोनों चूचुक बिल्‍कुल कड़े हो गये, मैंने अपने दोनों हाथों की उंगलियों से उनको सहलाना शुरू कर दिया। ‘आह्ह्ह्ह ह्ह…’ शशि की यह हल्‍की से बेजान कराहट भी कमरे के माहौल को और रोमांचक बनाने लगी। शशि की आवाज इतनी नशीली आज से पहले तो कभी नहीं थी, मैं तो बस उसमें खो जाने को बेताब था।

इधर विवेक भी शशि की नशीली आवाज से अधीर होकर उसकी तरफ ही मुड़ गया, उसने शशि की टांगों को चाटना शुरू कर दिया।

अब शशि पर दोहरा प्रहार होने लगा, ऊपर से तो मैं उसके चूचुक से खेल रहा था, और नीचे विवेक उसकी टांगों से! काजल बेचारी अकेली रह गई तो उसने भी आकर शशि पर ही हमला बोल दिया। अब तक शशि के गुलाब की पंखुड़ी जैसे होंठ काजल के होंठों में कैद हो चुके थे।

विवेक ने शशि की टांगों को सहलाते हुए ऊपर का रूख किया और उसकी गुलाबी आवरण से छुपी मांसल योनि की दरार पर उस परदे के ऊपर से ही अपनी जीभ से प्रहार शुरू कर दिया।

अब एक साथ तीन हमले सहने की स्थिति में शशि नहीं रही थी। शशि की बेचैनी अब बाहर आने लगी, उसने अपनी टांगें उठाकर एक जोरदार झटका विवेक को दिया, और अपने हाथ को अपनी गुलाबी पैंटी के ऊपर रखकर सीत्‍कार भरी- उफ्फ… कुछ करो प्‍लीज, इसके अन्‍दर चींटियाँ रेंगे रही हैं मैं मर जाऊँगी। प्‍लीज कुछ करो ना!

विवेक ने दोबारा शशि की गुलाबी पैंटी पर हाथ फिराते हुए मेरी तरफ देखकर पूछा- यह मौका मुझे मिलेगा क्‍या? हालांकि शशि की कामाग्नि पूरे उफान पर थी, और वह यह भी जानती थी कि इस समय वो तीन अलग अलग लोगों के साथ ये खेल खेल रही है पर फिर भी मैंने उससे पूछना जरूरी समझा।

‘यह मौका विवेक को दूं क्‍या?’ मैंने हौले से शशि के कान में पूछा। ‘सीईईईईई… हम्‍म्‍म्‍म्’ बस इतना ही बोल पाई शशि।

विवेक तो जैसे इसी इंतजार में था, उसने तुरन्‍त अपनी उंगलियों को शशि की पैंटी में फंसाकर उसको नीचे सरका दिया। शशि ने भी नितम्‍बों को हल्‍का सा उठाकर उसकी मदद की।

अब शशि का चिकना मांसल स्‍वर्ग जैसा योनिद्वार विवेक के सामने था। विवेक ने बहुत ही प्‍यार से उसके दोनों योनिओष्‍ट खोलते हुए भंगाकुर पर अपनी गीली जीभ रख दी। ‘आईईईईईई…’ सिसकारती हुई शशि ने पुन: आग्रह किया- प्‍लीज मैं मर जाऊँगी।

मुझसे मेरी शशि का ये करूण वन्‍दन बर्दाश्‍त न हुआ तो मैंने भी शशि के मोटे कामुक उरोजों को छोड़कर नीचे का रूख किया। काजल तो जैसे इसी प्रतीक्षा में थी, उसने तुरन्‍त अपने दोनों हाथों से शशि की उन खूबसूरत पहाड़ियों को ढक लिया।

उधर विवेक भी तब तक अपना बरमूडा नीचे सरका चुका था, विवेक का काला नाग शशि को डसने के लिये फुंकार रहा था। विवेक शशि की दोनों टांगें खोलकर उनके बीच में बैठ गया, उसने शशि के नितम्‍बों से उसको थोड़ा सा उठाकर मुझसे उसके नीचे एक तकिया लगाने का इशारा किया, मैंने तकिया लगाकर शशि के नितम्‍बों को थोड़ा ऊपर कर दिया।

विवेक ने पहले तो शशि की दोनों टांगों को उठाकर अपने कंधों पर रखा फिर समय न गंवाते हुए अपने प्रेमदण्‍ड का गुलाबी मुखड़ा शशि के स्‍वर्गद्वार पर रख दिया।

उत्‍तेजना में शशि ने काजल के बाल पकड़कर खुद से चिपका लिया। विवेक ने धीरे धीरे से शशि के अन्‍दर सरकाना शुरू किया, शशि का टांगें खुद-ब-खुद ही पूरी फैल गई। थोड़े प्रयास के बाद ही विवेक ने शशि की गुफा पर पूरा कब्‍जा कर लिया।

शशि ने भी अपनी फैली टांगों को बन्‍द करके अब विवेक को कमर से पूरा जकड़ लिया। मुझे शशि को यूं विवेक की बाहों में खुश देखना बहुत अच्‍छा लग रहा था। आज पहली बार शशि मुझे इतनी कामुक लगी।

अब काजल भी शशि से अलग हो गई तो विवेक पूरी तरह शशि के ऊपर आ गया, उसने शशि के कड़े चूचुक को अपने होठों से चूसना शुरू कर दिया। विवेक के झटके धीरे धीरे तेज होने लगे। आहहहह… ऊफ्फ्फ्फ… की आवाज के साथ शशि भी अपने अन्‍दर के आनन्‍द का अनुभव हमें करा रही थी।

पसीने से तरबतर हो चुकी शशि किसी खूबसूरत महारानी से कम नहीं लग रही थी। विवेक उस महारानी के गुलाम की तरह उसकी सेवा में लगा था। उसे तो आज मेरी महारानी को संतुष्‍ट करना था। एक नया अनुभव मिलने वाला था मेरी जानेमन को!

अचानक विवेक के आघात में तेजी आ गई और बस कुछ ही प्रहार उसके बाद विवेक निढाल सी शशि के ऊपर गिरा। शशि तो जैसे स्‍वर्ग का आनन्‍द ले रही थी।

ऐसा नहीं है कि मैंने पहले कभी शशि को ऐसी अवस्‍था में नहीं देखा पर आज शशि मुझे बहुत ही प्‍यारी लग रही थी। शशि की खूबसूरती में जो निखार मैं अब देखने लगा था वो पहले कभी महसूस नहीं किया, और ऐसा नहीं था कि यह सिर्फ मेरा भ्रम था।अक्‍सर मिलने वाले सभी लोग इस बात को कहते तो शशि की खूबसूरती की तारीफ सुनकर मैं भी तो गदगद हो जाता।

हाँ, एक बात जरूर है, शशि को आज से पहले मैंने इतना कामातुर कभी नहीं देखा था और उसके लिये मैं विवेक और काजल का शुक्रगुजार भी था। वो शशि जो कुछ महीने पहले तक मुझे बोझ और बेकार लगने लगी थी अब मुझे मेरे जीवन में किसी वरदान से कम नहीं लगती थी, और मैं भी तो उसकी खुशी का पूरा ध्‍यान रखने लगा था।

कुछ ही पलों के बाद शशि की चेतना लौटने लगी, उसने आँखें खोली। मैं ही तो खड़ा था उसके सामने… उसकी निगाह सीधी मुझसे मिली। शर्म और सुख का मिलाजुला असर मुझे उसकी नजरों में दिखाई देने लगा। उसने भी निगाह मिलाकर मुस्‍कुराते हुए नजरें झुका लीं।

विवेक भी शशि के ऊपर से उठकर बराबर में पड़ी चादर से अपने और शशि के कामांगों से रिसने वाले रस को साफ करने लगा।

कमरे में चारों तरफ देखकर शशि ने मुझसे बहुत ही मीठी आवाज में पूछा- काजल कहाँ है?

कहानी जारी रहेगी। [email protected]

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