वो तोहफा प्यारा सा -5

इस बार अचानक बाजी पलटी। एक जगह दोनों महिलायें हार गई और जीत पुरूषों की हुई।

सोनम और श्वेता ने हतप्रभ सी निगाह से एक दूसरे की तरफ देखा। अभी वो दोनों कुछ बोल पातीं उससे पहले ही मैंने… उन दोनों को टॉप (ऊपरी वस्त्र) उतारने का फरमान सुना दिया।

शिवम ने सोनम के अंदाज में ही मेरी की पीठ थपथपाते हुए कहा- अब आया ऊंठ पहाड़ के नीचे!

श्वे‍ता और सोनम दोनों ही बस एक दूसरी की तरफ देख रही थी।

तभी मैंने पूरे जोश में कहा- देखी हम मर्दों की जुबान, जो कहा वो किया क्योंकि हमने खेल के शुरू से ही जो शर्त तय हुई थी उसको माना, तुम औरतो को देख लो, तीन बार जीती तो कितनी जोर जोर से उछल रही थी। अभी एक ही बार हारी तो बस कहानी खत्म… क्या यही जुबान है तुम्हारी?

तभी शिवम ने भी ताना मारा- अरे जो अपने बस में नहीं, वो बोलते ही क्यों हो?

सोनम तो गुस्से में दिखाई दे ही रही थी पर दोनों का चेहरा फक्क पड़ चुका था। ऐसा भी होगा ये तो सोचा ही नहीं था।

दोनों महिलाओं ने नजरों ही नजरों में एक दूसरे से न जाने क्या मौन सहमति ली और सोनम ने अपना टॉप निकाल दिया।

श्वेता ने एक बार सोनम की ओर देखा और फिर मेरी ओर… दोनों की आँखों के इशारे को पढ़कर श्वेता ने भी थोड़ी हिम्मत दिखाई और अपना टॉप निकाल दिया।

अब दोनों महिलायें जीन्स और ब्रा में पुरूषों के सामने बैठी थी। उन दोनों की इस हालत का असर शिवम और मेरी चड्डी में दिखाई देने लगा था। श्वेता की निगाह सबसे पहले शिवम की चड्डी पर ही गई तो देखा उसके अन्दर तम्बू बन चुका था।

उधर शिवम भी लगातार श्वेता की नजरों का पीछा कर रहा था, दोनों की नजरें आपस में मिली तो श्वेता ने शर्म से नजरें नीचे झुका ली।

शिवम ने तुरन्त आगे खेलना शुरू किया। पुनः खेल चल पड़ा।

मेरी निगाह निरन्तर सोनम की ब्रा में छुपे खजाने को निहार रही थी। श्वेता ने मेरी की ओर देखा, मेरी निगाहों का पीछा करते श्वेता की नजरें सोनम की तरफ घूमी।

सोनम भी अपने उस खजाने को उभार कर मेरी चड्डी में होने वाली हलचल का मजा ले रही थी।

इधर शिवम की आँखें लगातार श्वेता के गोरे और मोटे दुग्धकलशों पर ही टिकी थी।

शुरू-शुरू में श्वेता थोड़ा असहज थी पर धीरे-धीरे झिझक कुछ कम होने लगी।

शिवम की चड्डी पर बन चुकी छोटी सी पहाड़ी देखकर श्वेता के होठों की मुस्कुराहट भी मुझसे छिप न सकी, जो शायद शिवम ने महसूस कर ली और तुरन्त अपनी चड्डी को हाथों से ढक लिया।

इस सब का परिणाम यह हुआ कि महिलाओं का ध्यान खेल से पूरी तरह हट गया।

‘हुर्रे हुर्रे हुर्रे…’ इस बार भी पारी भी महिलायें हार गईं।

आने वाली मुसीबत से आशंकित होते हुए श्वेता ने सोनम पर लापरवाही से हारने का आरोप मढ़ दिया, ‘ओय मैडम, अपनी नजरों को संभालो, बताऊं क्या सबको कि तुम्हारा ध्यान कहाँ था?’ सोनम ने झल्लाते हुए सफाई दी।

श्वेता ने सकपकाते हुए इधर उधर देखा। पर तब तक शिवम ने दोनों महिलाओं को जींस उतारने का आदेश दे दिया।

श्वेता तो आँखें निकाल कर शिवम को देख रही थी, जैसे सोच रही हो कि अब क्या करूं? सोनम भी चुपचाप वहीं बैठी रही।

शिवम ने फिर कहा- ज्यादा मत सोचो, उतारती हो या हमें उतारें?

वो दोनों फिर भी ऐसे ही बैठी रहीं तो शिवम ने बराबर में बैठी सोनम को पकड़कर जमीन पर लिटा दिया और जबरदस्ती उसकी जीन्स खोलकर नीचे सरका दी।

अब सोनम सिर्फ नीले रंग की ब्रा और पैंटी में हमारे सामने थी। मेरी निगाहें तो सोनम की टांगों पर ही टिक गई।

तभी शिवम ने मुझे झझकोरते हुए कहा- भाई, जब ये हमारे कपड़े उतरवा रही थी, तब तो बहुत तेजी से उतार रहा था। अब जब हम जीते हैं तो इतना शांत क्यों बैठा है? यह नयन सुख तो बाद में भी मिल सकता है। पहले श्वेता की जींस नीचे कर, या यह शुभ काम भी मैं अपने हाथों से ही कर दूं?

श्वेता अब शिवम से विनती करती हुई बोली- इतने निर्दयी तो आप नहीं लगते?

शिवम ने तपाक से जवाब दिया- निर्दयी तो आप भी नहीं लगती थी, पर आपने आदेश दिया ना, और हमने अच्छे दोस्त की तरह आपकी बात मानी भी। अब आपका भी फर्ज है कि हमें भी उन गोरी चिकनी केले के तने जैसी टांगें देखने का मौका मिलना चाहिए जो अभी तक सिर्फ फोटो में देखकर ही आहें भरते रहे हैं।

श्वेता शिवम की बात सुनकर शर्मा गई पर जींस उतारने की बजाय वो मेरी ओर देखने लगी। नजरें मिलते ही मैंने भी मौन सहमति दे दी।

वह फिर भी नारी सुलभ लज्जा से वहीं बैठी रही। तभी शिवम ने मुस्कुराते हुए मेरी पीठ पर हल्का हल्का हाथ फेरते हुए कहा- लगता है श्वेता चाहती है कि ये शुभ काम मैं ही अपने हाथों से करूं। ‘नहीं…’ अचानक श्वेता के मुख से जोर की आवाज निकली और वो वहाँ से खड़ी हो गई।

उसने हम तीनों की तरफ अपनी पीठ घुमाई और धीरे धीरे अपना हाथ अपनी जींस के हुक पर ले गई। मन में कुछ हया ऽ.

. ऽ.. ऽ.. ऽ.. ऽ.. ऽ.. और एक अन्जाना डर शायद उसे रोक रहा था।

पर अब वो अपनी बात में घिर चुकी थी तो ये करना तो था ही। उसने भी मन कड़ा किया, आँखें बन्द की और अपनी जींस का हुक खोल दिया। पर अभी भी वो जीन्स को पकड़कर ही खड़ी थी, चाह कर भी उसको नीचे नहीं सरका पा रही थी कि तभी सोनम ने मेरे पैरों में गुदगुदी की और खुद ही ‘आह…’ की कातर ध्वनि के साथ उसने अपने हाथ जींस नीचे मेरे पैरों तक सरका दी।

‘हाय… अल्लाह…? ये तो जान ही ले लेगी।’ श्वेता की काले रंग की पैंन्टी में फंसे नितम्बों और टांगों को देखकर शिवम ने अपने दिल पर हाथ रखते हुए ये ही शब्द तो कहे थे।

श्वेता ने जिस नजाकत भरी निगाहों ने पीछे मुड़ की हम तीनों की तरफ देखा। तो उसकी इस अदा पर मैं ही मर मिटने को तैयार था। हम तीनों ही के मुंह खुले के खुले रह गये और निगाह श्वेता की पीठ और टांगों पर थी। श्वेता वहीं नजरें नीची किये खड़ी थी।

‘वैसे तो तुम्हें कई सालों से ऐसे देखता आ रहा हूँ पर आज तो यार तुम एकदम नशीली बोतल लग रही हो।’ मैंने श्वेता को छेड़ते हुए कहा।

शिवम बोला- इस नशीली बोतल का मुखड़ा देखने का हक हमारा भी बनता है मोहतरमा… थोड़ा सा तो इधर घुम जाइये, नहीं तो हमें उधर आना पड़ेगा।

शिवम का इतना कहना था कि सोनम ने खड़े होकर श्वेता को कंधों से पकड़कर हमारी तरफ घुमा दिया। ‘हाय दैय्या…’ मैंने तो शर्म से अपना चेहरा ही छुपा लिया।

शिवम और मैं दोनों ही उठकर मेरे पास आये और उसके से हाथों को हटा दिया। हम दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट थी।

श्वेता ने ध्यान बंटाने के लिये फिर से अंताक्षरी खेलने को कहा। ‘सिर्फ अंताक्षरी ही खेलोगी क्या? अगर तुम चाहो तो हम उससे भी अच्छा खेल खेलना जानते हैं।’ शिवम ने कहा।

श्वेता बस अपना चेहरा हाथों में छुपाये खड़ी थी कि मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया।

तभी श्वेता ने हल्की सी अंगड़ाई ली तो मैंने देखा शिवम उसकी पीठ पर बहुत ही अनोखे ढंग से कुछ उंगलियाँ फिरा रहा था। पर श्वेता उन उंगलियों का आनन्द भी ले रही थी ऐसा मुझे महसूस हुआ। शायद वो उनको मेरी ही उंगलियाँ समझ रही थी या फिर शिवम की उंगलियों का आनन्द ही ले रही थी।

‘आह्ह्ह…’ की एक कामुक सिसकारी के साथ श्वेता जैसे मुझमें और अधिक सिमटने का प्रयास करने लगी।

मैंने भी अपने तपते होंठ श्वेता की गुलाबी पंखुड़ियों पर रख दिये, मैं अपने होंठों से हल्की सी जीभ बाहर निकाल कर श्वे‍ता के गरम होठों को सहलाने लगा। पर मुझे श्वेता अपनी पीठ पर होने वाली उंगलियों की थिरकन का आनन्द लेती महसूस हुई।

मैं भी तो यही चाहता था कि श्वेता शिवम के हाथों का पूरा आनन्द ले।

उसका पूरा बदन एक झटके में अकड़ने लगा, बदन की अकड़न इतनी तेज थी कि वो मेरी पकड़ से छूट गई। उसकी आँखें बंद थी।

मैंने उसके होंठों को भी छोड़ दिया। शिवम की उंगलियाँ अब श्वेता के नाभि प्रदेश में दस्तक देने लगी।

उसका पूरा शरीर कंपकपा रहा था… वो जैसे खड़े होने की स्थिति में ही नहीं थी… आँख भी नहीं खोल पा रही थी। श्वेता जैसे अर्धचेतन अवस्था में थी। वो तो अचानक गिर ही जाती यदि शिवम ने अपने हाथों ने उसे थाम ना लिया होता तो!

वो शायद यह अच्छी तरह समझ चुकी थी कि ये हाथ मेरे नहीं हैं इसी शर्म का अहसास ये वो आँखें भी नहीं खोल पा रही थी। पर आँखें बन्द करके वो शिवम की उंगलियों का पूरा आनन्द भी उठा रही थी।

शिवम ने श्वेता गिरते हुए संभाला और वहीं फर्श पर लिटा दिया। अब वहाँ हम चारों में कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। श्वेता भी अब बस उस माहौल का आनन्द ले रही थी तो मैंने अपना रूख सोनम की ओर किया।

सोनम बड़ी ही कातर दृष्टि से हम तीनों की ओर देखते हुए ताना मारकर बोली- लगता है मेरी तो यहाँ किसी को जरूरत ही नहीं है।

मैंने तुरन्त सोनम के पास जाकर उसके होठों पर मीठा सा चुम्बन किया। सोनम ने भी सहयोग करके उस चुम्बन को ही काफी लम्बा कर दिया।

मैंने सोनम को समझाया- श्वेता इस खेल में नई है तो पहले उसका साथ जरूरी है हम तो बाद में भी खेल सकते हैं। मेरी बात पर सोनम से भी सहमति दिखाई और अब वो भी हमारा सहयोग करती दिखाई दे रही थी।

शिवम ने श्वेता फर्श पर लिटाने के बाद उसके बायें कान के नीचे गर्दन पर अपने होंठ रख दिये। ‘उई मां…’ बोलकर श्वेता ने भी अपनी उत्तेजना व्यक्त की।

शिवम हौले हौले मेरे उस भाग को अपने होठों से सहलाने लगा।

हालांकि श्वेता उस समय अर्धचेतनावस्था में थी पर उसकी मुद्रा यह दर्शा रही थी कि वो पूरे होश में उस वातावरण का आनन्द ले रही है। इधर मैं भी बराबर में पड़े सोफे पर अधलेटी सोनम के बदन पर हाथ फिरा रहा था पर निगाहें सिर्फ श्वेता को ही देखना चाहती थी।

हौले हौले शिवम के होंठ श्वेता की ब्रा के ऊपर हिस्से पर उसके बदन को छूने लगे। ‘ईस्‍शिस्स…’ अचानक श्वेता के मुंह से निकला। वो इतनी बेचैन थी कि अपनी टांगें इधर उधर फेंकने लगी।

शिवम ने अपनी एक टांग उसकी दोनों टांगों पर रखकर उनको दबा लिया, एक हाथ की उंगली से उसकी नाभि सहलाने लगा और दूसरे हाथ से उसकी ब्रा के ऊपर से ही मेरे बांयें स्तन को बहुत ही प्यार से दबाने लगा।

श्वेता जब तक बर्दाश्त कर सकती थी करती रही, जब स्थिति काबू से बाहर होने लगी तो उसने शिवम की पकड़ से छूटने का असफल प्रयास किया।

शिवम जैसे ये बात समझ गया हो, उसने तुरन्त ही उसे आजाद कर दिया पर श्वेता यूं ही आँखें मूंदे पड़ी रही।

इधर सोनम भी मेरी चड्डी के ऊपर से लिंग को हल्के हल्के दबाने लगी, हाथ ऊपर नीचे फिरा का जैसे सहलाने सी लगी हो। अब शिवम एक टांग फैलाकर श्वेता के ऊपर आ गया और अपने दोनों घुटनों के बल बैठकर उसने मेरी दोनों बाहों से पकड़कर थोड़ा सा ऊपर किया।

मैंने सोनम को शिवम की मदद करने का इशारा किया तो सोनम ने तुरन्त आगे बढ़कर श्वेता की ब्रा का हुक खोल दिया, एक ही झटके में ब्रा श्वेता की दोनों बाहों पर झूल गई, दोनों स्तन ऐसे उछले जैसे अपनी आजादी का जश्न मनाने लगे।

सोनम अब वहाँ से फिर मेरे पास आई और मेरे होठों को अपने होठों में दबा लिया।

सोनम का बदन कामाग्नि में बुरी तरह तप रहा था, उसने खुद ही अपनी ब्रा भी खोल दी और मेरे हाथों में अपने खूबसूरत से वक्षस्थल पर रख दिया।

मैंने भी मौके की नजाकत को समझते हुए सोनम के छोटे छोटे परन्तु बेहद खूबसूरत स्तनों का मर्दन करना शुरू कर दिया। ‘आह…’ की कामुक ध्वनि के साथ सोनम मेरा पूरा साथ देने लगी।

इधर शिवम ने श्वेता की ब्रा को उसकी गोरी बाहों से अलग करके उसे पुनः फर्श पर लिटा दिया। अब श्वेता भी कुछ शिथिल सी होकर आराम की अवस्था में लेट गई पर उसकी आँखें लगातार बन्द ही थी।

शिवम पर श्वेता का पूरा नशा छाने लगा, उसने श्वेता के दोनों हाथों को ऊपर की ओर करके अपने दोनों हाथों से दबा लिया और अपने होठों के बीच श्वेता के बांये चूचुक को दबा कर अपनी जीभ से सहलाने लगा। ‘ऊफ्फ्फ…’ श्वेता सिसकारी।

अब तो ऐसा लगने लगा जैसे उसके पूरे बदन में आग लगने लगी, वो फर्श पर पड़ी भी इधर उधर लहराकर अपना आनन्द ही व्यक्तकर रही थी।

मैंने भी सोनम के लम्बे से निप्पल को अपने होठों में दबाकर उसका रसपान शुरू कर दिया।

शिवम के इस सहलाने के तरीके से श्वेता इतनी बेचैन हो गई कि कुछ ही पलों में उसने खुद ही शिवम का सिर पकड़ कर उसका मुंह अपने दायें चूचुक पर रख दिया। अब शिवम उसका रसास्वादन करने लगा।

इधर सोनम ने अपने पैरों को ऊपर करके मेरी चड्डी में फंसाकर उसको नीचे धकेल दिया। मेरा लिंग पूरा कड़क होकर सोनम की जांघ से टकराने लगा।

यूं तो मैं सोनम के ऊपर लेटा था पर मेरा सारा ध्यान श्वेता पर ही था।

सोनम ने जैसे ही अपने नाजुक हाथों में मेरा कड़क लिंग पकड़ा तो मेरा ध्यान उसकी तरफ गया, मुझे लगा कि मैं सोनम के साथ नाइंसाफी कर रहा हूँ।

मैंने तुरन्त अपना ध्यान सोनम पर दिया और थोड़ा नीचे सरकते हुए मैंने भी सोनम की पैंटी निकालकर सोनम को बंधन मुक्त कर दिया।

अब मेरा लिंग खुद ही सोनम की योनि के ऊपर भाग को छूने लगा तो सोनम भी आतुर होकर उसको अन्दर तक लेने का प्रयास करने लगी।

मैंने एक साथ से उसकी साफ सुथरी उभरी हुए योनि के भगोष्ठों को खोलते हुए अपनी जीभ के अगले किनारे से सोनम के भंगाकुर को सहलाना शुरू कर दिया।

उफ्फ्फ… की मादक सिसकरी के साथ सोनम अपने नितम्बों को उठा-उठाकर मेरा साथ देने लगी।

मैंने भी समय न गंवाते हुए सोनम को और तड़पाने का निर्णय लिया, मैं तुरन्त सोनम ऊपर से उठा और सोनम के पैरों को उठाते हुए उसको सोफे पर सीधा लिटा दिया। अब मैं सोनम के ऊपर बिल्कुल उल्टा अर्थात् उसकी योनि के ऊपर अपना मुख एवं उसके मुख की ओर अपना लिंग करके लेट गया।

सोनम ने भी मेरी जीभ के स्वाकत में अपनी दोनों टांगें और मेरे लिंग के स्वागत में अपना मुंह खोल दिया।

सोनम मेरे लिंग को पूरा अपने मुंह में भरकर किसी लॉलीपॉप की भांति चूसने लगी। मैंने भी अपनी पूरी जीभ सोनम की गहराई में सरका दी।

उधर श्वेता के पूरे बदन में गजब सी खुमारी छाने लगी, वो अपने जिस्मी को शिवम के जिस्म से रगड़ने का असफल प्रयास कर रही थी। अब शिवम ने भी उसकी बेताबी तो समझते हुए दोनों हाथों को छोड़कर नीचे का रूख किया।

उसने अपने दोनों हाथों के बीच श्वेता के विकसित उरोजों को दबा लिया श्वेता के वक्ष सोनम की अपेक्षा काफी उन्नत और पुष्ट थे इसीलिये शिवम भी उनका पूरा आनन्द लेना चाहता था, एक हाथ से वो लगातार उसके भरे हुए उरोजों से खेल रहा था और जीभ से नाभि के नीचे के हिस्से को चाटना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे नीचे होते होते उसके होंठ श्वेता की पूरी तरह गीली हो चुकी पैंटी तक पहुंच गये।

‘सीईईईईई…’ की कामुक सिसकारी के साथ श्वेता की नशीली आँखें अचानक खुल गई। श्वेता फर्श पर पड़ी जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी। शिवम उसके यौवन का पूरा रस पी रहा था, उसका पूरा बदन चाटने का चूमने का प्रयास कर रहा था और मैं सामने से श्वेता के इस यौनानन्द को देखकर उससे भी अधिक आनन्दित था।

मुझसे नजरें मिलते ही शर्म से श्वेता की शर्म से निगाहें नीचे झुक गईं। मैं एक पल को सोनम को छोड़कर श्वेता के पास पहुंचा तो उसने अपनी नग्न बाहें मेरी तरफ फैला दी। मैं भी भावविभोर होकर उसकी बाहों में समा गया।

श्वेता ने मुझे कस कर पकड़ लिया जैसे इशारे में श्वे‍ता ने मुझे उसको मिलने वाली सुखद अनुभूति के देने के लिये धन्यवाद दिया हो।

मैंने उसके कान में कहा- मैं तो कब से ये चाहता था कि तुम इस सुख को भोगो, मैं भी अपनी जान को किसी की बाहों में स्व‍च्छन्द खेलते देख सकूं। तुमको मजा आ रहा है ना?

‘हम्‍म अम्म देख म्म्म‍…’ श्वेता के कंपकंपाते होंठों से इतना बस ही निकला। उसने बहुत हल्की सी आवाज में फुसफुसाकर कहा कहा- बहुत मजा, पर अब आपके सामने शर्म भी।

मैंने समझाया- आज तुम शर्म को दूर रखो अब आनन्द की अनुभूति करो। इस धरती पर खेले जाने वाले श्रेष्ठतम आनन्द की अनुभूति। इसी खेल को कामक्रीड़ा कहते हैं। यही वो खेल है जो दुनिया में हजारों लाखें वर्षों से खोला गया है और खेला जाता रहेगा। आज तुम भी इस खेल के हर रस का आनन्द लो।

‘पर आपके सामने नहीं होगा, प्लीज, आँखें बंद कर लीजिये।’ श्वेता ने गिड़गिड़ाते हुए मुझसे कहा।

मैं श्वेता को इस आनन्द का एक पल भी गंवाने नहीं देना चाहता था इसलिये उसकी नजरों में नजरें डालकर उसे ‘हाँ’ का इशारा किया और होठों पर मीठा सा चुम्बन करते हुए उससे अलग हो गया।

श्वेता की नजरें मेरा ही पीछा कर रही थी। मैंने भी उस समय पूरी समझदारी का परिचय दिया और सोनम को लेकर सामने वाले कमरे में चला गया।

तब तक शिवम अपनी उंगलियों में फंसाकर श्वेता की पैंटी निकालने को प्रयासरत था। शिवम की अनेक कोशिश के बाद भी श्वेता उसको पैंटी निकालने नहीं दे रही थी।

मैंने पीछे मुड़ कर उन दोनों की इस समस्या को देखा तो वापस उसके पास आया। मुझे लगा शायद इसमें मेरा सहयोग करना ठीक रहेगा इसीलिये मैं श्वेता की बगल में जा लेटा।

मैं श्वेता की कमजोरी जानता था, मैंने उसको सिर्फ थोड़ी सी गुदगुदी की, श्वेता ने तुरन्त अपने नितम्बों को इधर-उधर हिलाना शुरू कर दिया। शिवम ने मौके का पूरा फायदा उठाया और श्वेता की पैंटी को निकालते हुए उसके कामद्वार का दर्शन किया।

मैं पुनः उनको छोड़कर सोनम के पास लौट आया।

शिवम ने श्वउता को गोदी में उठाया और उसी शयन कक्ष में ले आया जिसमें मैं और सोनम पहले से ही मौजूद थे। शिवम ने श्वेता को बिस्तार पर ऐसे लिटाया जैसे किसी फूल को रखा हो।

श्वेता का सुलगता जिस्म, नशीली आँखें, कंपकंपाते होंठ थरथराता बदन उसकी हालत बयाँ कर रहे थे।

श्वेता के पूर्णनग्न यौवन को देखकर शिवम का भी खुद पर काबू नहीं रहा, शिवम ने अपने बनियान और चड्डी वहीं निकाल दिये और बिस्तर पर श्वेता का टांगें फैलाकर उनके बीच आने का प्रयास करने लगा।

श्वेता ने अपनी दोनों टांगों को एक दूसरे में लपेटकर बचने का असफल प्रयास किया। यह तो शिवम भी जानता था कि श्वेता को इस समय सबसे अधिक आवश्यकता किस चीज की थी।

पर उसकी लज्जा… उसे वो करने से रोक रही थी। आँखें बंद किये दोनों हाथों से चादर को जोर से पकड़े श्वेता अपने सिर को इधर उधर झटका दे रही थी।

मैं श्वेता को ये सुख देने में शिवम की और भी मदद करना चाहता था पर पीछे से सोनम ने मुझे अपनी ओर खींच लिया।

ऐसे माहौल में सोनम की मजबूरी मैं समझ रहा था तो मैंने उसके पास जाना ही बेहतर समझा। मुझे करीब पाते ही सोनम ने मेरे खूंटे से तने लिंग पर अपने गर्म गर्म होठों को रख दिया।

अब मेरे लिये भी और रूकना मुश्किल था, मुझे लगा कि मेरा लावा छूटने ही वाला है, मैंने भी देर न करते हुए सोनम को कुर्सी से अपनी ओर पीठ करके खड़ा किया और फिर आगे की तरफ कुर्सी पर उसका अगला हिस्सा झुका दिया।

अब सोनम अपनी टांगों पर खड़ी कुर्सी पर झुकी हुई थी उसकी योनि पीछे की तरह उभर कर मेरे लिंग के बिल्कुल सामने थी। मैंने अपने लिंगमुण्ड को पीछे से उसकी योनि की दरार के बीच फंसाया और समय न गंवाते हुए एक ही झटके में पूरा लिंग सीधा उसकी गुफा में उतार दिया।

‘हाय मांऽऽऽ…’ की एक चीख सोनम के मुख से निकली। पर अब मैं उस चीख को सुनने की स्थिति में नहीं था। मैं लगातार सोनम के नितम्बों पर वार कर रहा था, जितना जोर लगा सकता था उतना अधिक जोर मेरे हर धक्के में बढ़ता जाता। शुरू के कुछ धक्कों में सिसकारी लेने के बाद सोनम भी हर धक्के में अपने नितम्बों को पीछे धकेल कर मेरा साथ देने लगी।

कुछ ही पलों में वो स्वर्णिम पल आ गया जिसमें मैं और सोनम दोनों एक साथ ही छूट गये मेरा लावा सोनम के अन्दर एक फव्वारे की भांति फूट गया।

सोनम भी तभी निस्तारित हुई और मेरे साथ ही निढाल होकर उसी कुर्सी पर बैठ गई। मैंने पहली बार महसूस किया था कि बन्द कमरे में कामानन्द लेने से कहीं अधिक आनन्द तब मिलता है जब अपने सामने कोई दूसरा भी ये आनन्द ले रहा हो।

ये क्षण अकेले में आनन्द लेने से दोगुना नहीं अपितु कई गुना अधिक आनन्ददायक थे।

कहानी जारी रहेगी। [email protected]

Comments:

No comments!

Please sign up or log in to post a comment!