एक नारी होने की व्यथा कथा-2

एक नारी होने की व्यथा कथा-1

मैं ऑफिस से लौट रहा था कि एक लड़की ने मुझसे लिफ्ट मांगी, बारिश के कारण वो मेरे साथ मेरे घर में है और अपनी आपबीती मुझे बता रही है कि उसकी शादी हुई और उसके बाद सुहागरात हुई, सुहागरात की अगली सुबह:

तभी मेरी ननद चाय लेकर आई और मुझे दिया फिर मुझे छेड़ते हुए कहा- क्यों भाभी कैसी कटी रात? मज़ा आया या नहीं? मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मैं बस मुस्कुरा कर रह गई। फिर उसने बोला- उठो और नहा कर तैयार हो जाओ, मैं नाश्ता लेकर आती हूँ और फिर नीचे चलेंगे। कुछ लोग तुम्हें देखने आने वाले हैं. और वो चली गई।

मुझे अभी भी नहीं चला जा रहा था ऐसा लग रहा था जैसे कोई सुइयां चुभा रहा हो। लेकिन अब तो कुछ हो नहीं सकता था तो मैं उठी और तैयार होकर अपने कमरे में आई तभी मेरी ननद फिर नाश्ता लेकर आई और फिर कुछ देर बाद हम नीचे गए।

ऐसे ही पूरा दिन निकल गया पर फिर भी मैं रात के ऊहापोह में उलझी पड़ी थी। फिर मैंने सोचा कि हो सकता हो कि कल उनके दोस्तों ने मज़ाक में शराब पिला दिया हो और उसके नशे में उन्होंने ऐसा किया हो। फिर बेचारा मन खुश होने लगा कि कल को एक काली रात समझ कर भूल गई और नए सपनों और कल्पनाओ में खो गई।

फिर रात हुई और मेरे पति कमरे में आए और फिर वही वहशीपन। जैसा मैंने दिन में सोचा था वैसा कुछ भी नहीं हुआ। मैं फिर एक बार उनका शिकार बन गई, फिर मेरे साथ मेरे शरीर का, मेरी भावनाओं का, मेरी उम्मीदों का, मेरे सपनों का विध्वंस होने लगा। फिर एक काली रात कटी।

फिर तीसरा दिन, चौथा दिन, पाँचवाँ दिन और अब तो रोज़ का यही खेल था।

मैंने भी हालातों से समझौता कर लिया। अब यही मेरी किस्मत थी। मैं चुपचाप हर दिन अपने आप को एक कोठे वाली कि तरह लुटता हुआ देखने लगी। अब तो आदत सी हो चली थी। ऐसा चलते चलते करीब दो साल हो गए लेकिन मैं माँ नहीं बन पा रही थी और मेरे ससुराल वाले अब ताने भी मारने लगे थे।

फिर एक दिन समय निकाल कर मैं एक डॉक्टर के पास गई और अपना पूरा चेकअप कराया और जब रिपोर्ट आया तो डॉक्टर ने बताया कि आप में कोई भी प्रोब्लेम नहीं है आप एक बार अपने पति का भी जांच करा लीजिये।

मैं घर आई और रात में जब मैंने अपने पति को इस बारे में बताया तो उसने मुझे मारना और गलिया देना शुरू कर दिया, साथ ही साथ वो बोल रहा था- मादरचोद, मैं तुझे नामर्द लगता हूँ। रंडी साली मुझे तू हिजड़ा समझ रही है अपनी कमी को तू मेरे ऊपर डाल रही है? मैंने कहा कि ऐसा नहीं है ये देखो रिपोर्ट, मैंने डॉक्टर से चेक कराया है।

तो उसने रिपोर्ट लिया और उसे फाड़ कर फेंक दिया और बाहर चला गया। ऐसा ड्रामा कई दिनो तक चलता रहा। और बिना मेरी गलती के मेरे ससुराल वालों ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया।

मेरी तो मानो दुनिया ही लुट गई, मैं बीच रास्ते एकदम बेसुध खड़ी थी कि क्या करूं? एक पल को तो खयाल आया कि आत्महत्या कर लूँ लेकिन वो करने की हिम्मत भी मेरे अंदर नहीं थी। मेरे माँ बाप ने ऐसे संस्कार जो दिये थे।

मैं क्या करूं… कहाँ जाऊं, यही सोच रही थी कि मेरे एक रिश्तेदार मिल गए और मुझे अपने घर ले गए। फिर मेरे पापा को फोन किया और मेरे घर वालों को अपने घर बुलाया। काफी कुछ होने के बाद मेरे पापा मुझे घर ले गए और दूसरे दिन आकर मेरे ससुराल वालों से बात कि तो उन्हें भी धक्के मार कर भगा दिया और मेरे पति ने बोला- मैंने तेरी बेटी को छोड़ दिया है, तुझे जो करना है कर ले। मेरे पिता बहुत सीधे हैं और मेरे घर में कोई भाई भी नहीं है जो मेरे लिए लड़ता तो मेरे घर वाले शांत होकर बैठ गए। वो कर भी क्या सकते थे। अभी मेरी छोटी बहन की शादी करनी थी।

कुछ दिन तक अपने मायके में थी लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था जैसे अब मैं अपने माँ बाप पर बोझ बन गई हूँ। तो मैंने नौकरी करने कि सोची और फिर हर जगह का फॉर्म भरने लगी और अंततः दिल्ली की एक कंपनी में मेरा चयन हो गया। लेकिन मेरे पापा मुझे अकेले यहाँ नहीं आने देना चाहते थे लेकिन मेरे काफी संघर्ष करने के बाद उन्होंने मुझे यहाँ नौकरी करने की अनुमति दे दी।

फिर मैं कुछ दिन बाद दिल्ली आ गई और एक पीजी में रूम ले लिया। वहाँ केवल एक दादा दादी और मेरे पापा के उम्र के अंकल थे। देखने में वो लोग ठीक व्यवहार के लगे तो मैंने उनको अपने जॉब के बारे बताया कि मुझे यहाँ एक कॉल सेंटर में जॉब लगी है और मेरा टाइम रात में जॉब करने का है। तो उन्होंने कहा- ठीक है.

और घर की एक चाभी मुझे भी दे दी और फिर मैंने अपनी जॉब जॉइन कर ली।

अब ज़िंदगी थोड़ी ठीक चल रही थी लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था। करीब 4 महीने बीत चुके थे, सब कुछ ठीक चल रहा था और अब मुझे दिन में सोने की आदत हो गई थी क्योंकि रात में मुझे नींद नहीं आती थी। ऐसे ही एक दिन मैं अपने साप्ताहिक अवकाश के दिन रात में अपने मोबाइल पर गेम खेल रही थी तभी मेरे दरवाजे पर एक दस्तक हुई तो मैंने पूछा- कौन? तो अंकल ने कहा- मैं हूँ, ज़रा दरवाजा खोलना!

मैंने उठ कर दरवाजा खोल दिया और वो मेरे रूम में आकार बैठ गए बोले- मुझे नींद नहीं आ रही थी और तुम्हें रात में जागते हुए देखा तो यहाँ चला आया। मैंने कहा- कोई बात नहीं, आप यहाँ बैठ सकते हैं।

फिर अंकल ने बात शुरू कर दी और हम बातें करने लगे। कुछ देर बातें करने के बात मैंने उनसे चाय पूछा तो उन्होंने हाँ कह दिया। मैं उठी और जा कर चाय बना कर लाई और उनको देने लगी तो चाय पकड़ने के बजाय उन्होंने बड़े ही गंदे तरीके से मेरा हाथ छू कर चाय ले ली। मुझे बड़ा अजीब लगा. खैर मैंने बात वहीं खत्म कर दी और हम बैठ कर चाय पीने लगे.

काफी देर तक हम दोनों चुप रहे, फिर उन्होंने बातें करना शुरू किया और कुछ देर बातें करने के बाद उन्होंने एक कप और चाय के लिए कहा तो मैं उठी और खाली कप उठा कर किचन की तरफ चल दी और फिर गैस जला कर चाय चढ़ा दी. तभी मेरे पीछे पीछे अंकल भी किचन में आ गए।

मैंने उनसे कहा- आप बाहर बैठिए, मैं अभी चाय बना कर लाती हूँ! तो उन्होंने कहा- नहीं, मैं यहीं ठीक हूँ!

और थोड़ी देर बाद वो मेरे और करीब आए और मेरे कान में धीरे से बोले- तुम और तुम्हारा जिस्म दोनों ही बहुत सुंदर है, जी कर रहा है कि तुम्हें मन भर कर प्यार करूँ! और इतना कहते कहते वो रुक गए।

मैंने उनकी तरफ घूर के देखा तो उन्होंने नज़रें फेर ली और मैं जैसे ही चाय छानने के लिए मुड़ी उन्होंने मेरे कूल्हों पर हाथ रख दिया. मैं अचानक हुए क्रिया से चौंक गई और मैंने पलट के उन्हें अपने से दूर धकेल दिया। लेकिन शायद वो इसके लिए तैयार थे और वो एक कदम हिले भी नहीं और मुझे अपनी बाँहों में दबोच लिया। मैं उनकी बाहों में छटपटाती रही लेकिन उन्होंने मुझ पर कोई तरस नहीं दिखाई और मुझे अपनी बाँहों में और ज़ोर से कसने लगे।

मेरा किचन भी बहुत अंदर था, अगर चिल्लाती भी तो कोई सुन नहीं पाता और शायद वो भी इसी बात का फायदा उठाना चाहते थे। मैं अपने बचने की नाकाम कोशिश करती रही लेकिन कामयाब नहीं हो सकी और उस दरिंदे ने मेरी एक न सुनी और मुझे बड़ी बेदर्दी से अपनी हवस का शिकार बना लिया।

एक बार फिर मेरा अतीत मेरे सामने से गुज़र गया, फिर एक बार मेरी मर्यादाओं का हनन हुआ फिर एक बार मेरे सपने कुचले गए, फिर एक बार मेरी अस्मत लूटी गई, फिर एक बार मेरा देह शोषण हुआ, फिर एक बार… सब कुछ हो जाने के बाद मैं एकदम निष्क्रिय पड़ी हुई थी फिर भी उसकी हवस खत्म ही नहीं हो रही थी बल्कि बढ़ती ही जा रही थी। उस रात उसने 5 बार मेरे शरीर को रौंदा और मुझे अपनी हवस का शिकार बनाया।

अभी सुबह होने में एक घंटा था तो वो उठा और अपने कपड़े सही किए और जाने लगा। जाते जाते उसने कहा- सुन ये सारी बातें किसी से मत कहना, वरना किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी.
और मैं तेरी इज्ज़त नीलम करवा दूँगा। वो क्या कह रहा था मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, मैं तो बस अपनी किस्मत को रो रही थी।

खैर वो चला गया और मैं काफी देर बीतने के बाद मैं उठी और बाथरूम गई और अपने आप को साफ किया और नहा कर वापस आ कर कपड़े पहने और बिस्तर पर बैठ कर रोने लगी। अब तो ये हर रोज़ का हो गया और मेरे शरीर का मर्दन हर रात की दर्द भरी दास्तान थी। कभी अगर मैं दरवाजा खोलने से मना कर देती तो तो वो बाहर हल्ला करने लगता कि मैंने किसी लड़के को अपने घर बुलाया है। बदनामी के डर से मुझे दरवाजा खोलना ही पड़ता था।

इसी तरह 3 महीने बीत गए और अब ये सब मेरे बर्दाश्त से बाहर हो गया था। मैंने दूसरी जगह रूम शिफ्ट करने की सोची लेकिन फिर कहीं वहाँ भी ये सब न शुरू हो जाए, ये सोच कर मैं चुप हो गई। मैंने इसे ही अपनी किस्मत मान लिया और जैसा चल रहा था चलने दिया और बाकी सब भगवान पर छोड़ दिया।

एक दिन की बात है मैं ऑफिस से वापस आ रही थी कि रास्ते में मुझे एक 50-52 साल की औरत मिली जो शक्ल और पहनावे से बहुत शरीफ़ लग रहीं थी। हम दोनों में धीरे धीरे बातें शुरू हुई और बात करते करते पता चला कि उनका अपना दो मंज़िला घर है लेकिन उसमें वो अकेली रहती हैं और कोई उनके साथ नहीं रहता था।

मैंने बात ही बात में उनसे किराए की बात की तो उन्होंने कहा- इतना बड़ा घर है, अगर तुम्हें आकर रहना है तो रहो किराये की क्या बात है और वैसे भी अगर तुम रहोगी तो मुझे भी कोई बात करने वाला मिल जाएगा और दो वक़्त का शुद्ध खाना मिल जाया करेगा और मैं भी तुम्हारे माँ जैसी ही हूँ तो थोड़ी सेवा कर देना, बस हो गया मेरा किराया!

मुझे भी उनकी बात सही लगी और फिर हमने एक दूसरे का फोन नंबर ले लिया और घर आकर कपड़े बदले और खाना बनाया और फिर बैठ कर कुछ सोच रही थी कि उन आंटी का फोन आया कि बेटी कब से आने का प्लान बनाया है। मैंने कहा- आंटी इस सप्ताह में ही आऊँगी। और मुझे रात में ही समय मिलता है तो रात 11 या 12 बजे की करीब आऊँगी। उन्होंने कहा- ठीक है, जब आना होगा तब बता देना।

मैंने आंटी से रात में आने की बात इसलिए कही की मेरे मकान मालिक को ये पता न चले कि मैं कहाँ गई, नहीं तो वो वहाँ भी मेरा जीना हराम कर देता और वैसे भी मेरे पास कोई सामान ज़्यादा था नहीं बस एक सूटकेस और एक बैग! बाकी तो मकान मालिक का ही था जैसे बेड, गद्दे, बर्तन, फ्रिज, कूलर और मेरा रूम रेंट का भी टाइम हो गया था कि एडवांस देना था अगले महीने के लिए तो इससे अच्छा समय नहीं था घर छोड़ने का।

मैंने भी एक दिन प्लानिंग की और अपना समान पैक किया और नीचे जाकर अंकल को बोला- आप ये चाबी रख लीजिये, मैं अपने घर जा रही हूँ 10 दिनों के लिए… जब आऊँगी तो आप से ले लूँगी।

उन्होंने बिना कुछ बोले चाबी ले ली और मैंने बाहर निकल कर एक ऑटो बुक किया और अपना समान लेकर बैठ गई।

जैसे ही ऑटो वाला वहाँ से आगे बढ़ा, मैंने आंटी को फोन कर दिया कि मैं आ रही हूँ। उन्होंने कहा- ठीक है.
और फिर एक घंटे में मैं वहाँ पहुँच गई।

उन्होंने बड़े ही अच्छे तरीके से मेरा स्वागत किया। उनका घर सच में बहुत बड़ा और सुंदर था। नए जमाने की सारी सुविधा थी उस घर में! बातों बातों में मैंने उनसे पूछा- आपने ये सब कैसे लगवाया? लगता है आपको ऐसी चीजों का काफी शौक है? उन्होंने कहा- नहीं, मेरा एक ही बेटा है और वो विदेश में रहता है और जब आता है तो ऐसी चीजें लगवा जाता है और जब आता है तो वही चलाता है। मुझे तो चलना भी नहीं आता। और फिर उन्होंने अपने बेटे और बहू की फोटो दिखाई।

खैर कुछ देर बाद उन्होंने मुझे ऊपर का एक कमरा दिखाया जो बड़ा ही खूबसूरत था। उन्होंने बताया कि उनको एक बेटी की बहुत चाह थी लेकिन बस एक ही बेटा पैदा कर पाये लेकिन उसके चाह में हमें ये कमरा अपने पसंद से तैयार किया था जो आज से तुम्हारा है तुम इसी में रहोगी।

मुझे तो मानो अपने किस्मत पे भरोसा ही नहीं हो रहा था। इतना अच्छा घर और इतना अच्छा कमरा तो मेरे घर का भी नहीं था।

खैर मैं कमरे में गई और अपना सामान किनारे रखा और आंटी ने कहा- फ्रेश हो कर आओ, फिर खाना खाते हैं। मैंने कहा- खाना आपने बनाया है? तो उन्होंने कहा- नहीं, आज मैंने बाहर से मँगवा लिया था, कल से घर में बनेगा। मैंने कहा- ठीक है!

फिर वो नीचे चली गई और मैंने अपना सामान खोला कि सेट कर दूँ। मैंने इधर उधर नज़र दौड़ाई कि अलमारी कहाँ है तो मुझे वहाँ एक दीवाल में लगी हुई अलमारी दिखी और जब मैंने उसे खोला तो उसमें काफी कपड़े थे और एक साइड पूरा खाली था।

खैर मैंने खाली वाली अलमारी में अपना सामान सजा दिया और फ्रेश होकर नीचे चली गई।

खाना खाते खाते मैंने उनसे पूछा- अलमारी में इतने कपड़े किसके हैं। तो आंटी ने बताया- बस ऐसे ही खरीद के रखे हुये हैं, आज से उन्हें तुम पहनना।

हमने खाना खत्म किया और कुछ देर बातें करने के बाद हम सोने चले गए। मुझे तो ये किसी सपने जैसा लग रहा था। कल तक मेरी किस्मत मुझे रुला रही थी और आज अचानक इतना कुछ, मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये सब मेरे साथ हो रहा है।

उसने बातें रोकते हुये मुझसे कहा कि वो आज भी उसी घर में रह रही है और उसकी आंटी उसे अपने बेटी से ज़्यादा मानती हैं।

फिर उसने बताना शुरू किया कि रूम बदलने के बाद से मुझे कोई प्रोब्लम नहीं हुई, मैं बहुत ही अच्छे से आंटी के साथ रह रही हूँ लेकिन एक महीने पहले मेरी ऑफिस में एक नया बॉस आया और जैसे ही एक मीटिंग में उसने मुझे देखा, तब से उसकी नीयत मुझ पर खराब हो गई और आज उसने अपने घर में एक पार्टी में मुझे बुलाया था। मुझे लगा उसने सभी को बुलाया होगा लेकिन उसके घर जाने के बाद पता चला कि वो उसका घर नहीं उसका फार्म हाउस है और उसने सिर्फ मुझे बुलाया था।

मैं जब वहाँ पहुँची तो वो उसने मेरा अच्छा वैल्कम किया और मुझे अंदर ले गया और फिर किसी काम से बाहर चला गया और 2 घंटे बाद वापस आया और आते ही मुझे पकड़ने लगा। एक बार फिर मेरे साथ वही सब होने जा रहा था, फिर एक बार मेरा अतीत मेरे सामने आ गया और उसकी इस हरकत से न जाने मुझे कहाँ से गुस्सा आ गया और मैंने उसे दो थप्पड़ मार दिये और चलने लगी तो उसने मेरे साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश कि लेकिन कैसे भी मैं वहाँ से छुड़ा के भागी तो उसने कहा कि तू इतनी रात को कहाँ जाएगी यहाँ कोई साधन नहीं मिलता, आएगी तो मेरे ही पास, जा तू भी कर ले अपने मन की। आना तो तुझे मेरे ही पास है।

मैंने उसकी बातों को अनसुना करते हुए आगे बढ़ना ही अच्छा समझा.
और काफी देर से किसी गाड़ी का इंतज़ार कर रही थी कि कोई आए और शायद भगवान ने मेरी सुन ली और आप आ गए। आज तक जितने भी मिले सब अपने ही मन की करना चाहते थे और अपने ही मन का किया, किसी ने एक बार भी ये नहीं पूछा कि मुझे क्या चाहिए या मेरी क्या इच्छाएँ हैं। बस मुझे अपने मनोरंजन का साधन बना कर लूटते रहे।

रात के 1:45 हो रहे थे और मैं शांत उसको सुन रहा था, फिर मेरा ध्यान बंटाते हुए उसने मुझे कहा- ये थी मेरी कहानी, आशा करती हूँ आपको अब तक अपने सभी सवालों के जवाब मिल गए होंगे।

मैं क्या कहूँ मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, मैंने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए उससे कहा- आपकी कहानी सच में दर्द भरी है मैं कुछ कहना तो चाहता हूँ लेकिन मेरे पास कोई शब्द नहीं मिल रहे हैं कि कैसे कहूँ और क्या कहूँ।

उसने कुछ नहीं बोला, कुछ देर तक हम ऐसे ही चुप बैठे रहे और फिर मैंने कहा- अगर आपको नींद आ रही हो तो आप मेरे बेडरूम में जा कर सो सकती हैं।

उसने कहा- जिस रात ये बातें मेरे जहन में आ जाती हैं. उसके बाद नींद मुझसे कोसों दूर हो जाती है। अगर आपको नींद आ रही है तो आप सो सकते हैं मैं यहीं ठीक हूँ। मैंने कहा- नहीं, मुझे भी नींद नहीं आ रही है. तो उसने चाय के लिए पूछा तो मैंने भी हाँ कर दिया।

वो चाय बना कर लाई और हम साथ बैठ कर चाय पीने लगे। चाय पीते पीते उसने मुझसे पूछा- आपकी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है? मैंने कहा- नहीं, मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है। माधवी- क्यों कोई मिली नहीं या बनाया नहीं? मैंने कहा- नहीं, ऐसा नहीं है, मेरी दो गर्लफ्रेंड रह चुकी हैं लेकिन अब नहीं है. माधवी- क्यों क्या हो गया था? उन्होंने आपको छोड़ दिया या आपने? मैंने कहा- न उन्होंने मुझे छोड़ा न मैंने। हमारे रास्ते अलग थे और अंत में अलग हो गए, अब किसी से कोई संपर्क नहीं है।

मैंने उसे अपनी पहली गर्लफ्रेंड जो मुझे ऑफिस में मिली थी और दूसरी जो मेरे रूम के ठीक सामने रहने आई थी, उसके बारे में सारी बातें बताई।

हमें बात करते करते भोर के 4 बज गए और हम पता नहीं कब ड्राइंग रूम में ही सो गए और सुबह 8 बजे उसने मुझे जगाया।

मैं उठा तो उसने मुझे चाय दी और कहा- सुबह हो चुकी है, अब मुझे ऑटो भी मिल जाएगा तो मैं चलती हूँ. और आप का बहुत बहुत धन्यवाद। अगर आप कल रात नहीं होते तो न जाने मैं कहाँ जाती।

मैंने कहा- ठीक है, लेकिन ऑटो से क्यों, मैं आपको छोड़ देता हूँ! तो पहले तो उसने मना किया लेकिन फिर मान गई और तैयार होकर हम उसके घर के लिए निकल गए।

आधे घंटे में हम उसके घर पहुँच गए। उसने मुझे अपने घर के अंदर भी बुलाने का प्रयास किया लेकिन मैंने मना किया तो फिर उसने मुझसे मेरा नंबर मांगा और मुझे अपना नंबर दिया और फिर वापस अपने घर आ गया. आज मेरा अवकाश था तो मैं दिन भर अपने घर में बैठा उसी के बारे में सोचता रहा कि हम आज 21वीं सदी में जी रहे हैं और क्या सच में एक नारी का सम्मान आज भी उसे प्राप्त नहीं है। जो लड़की या औरत हिम्मत कर जाती है वो अपने सपनों कि दुनिया बना लेती है लेकिन आज भी 70 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएं हैं जो आज भी किसी न किसी कि हवस का शिकार होती हैं और हम औरतों को ही गलत कहते हैं। कभी कभी तो आत्मग्लानि होती है ऐसे परिवेश का हिस्सा बनकर जहाँ एक नारी सम्मानित होकर भी सम्मानित नहीं।

तो दोस्तो, ये थी मेरी एक और कहानी जिसमें एक नारी की अन्तर्व्यथा से मेरा मिलन हो गया और साथ ही ये भी पता चल गया कि जो भी इस धरती पर है उसका भी उतना ही अस्तित्व है जितना कि दूसरे का।

आप सभी पाठकों से निवेदन है कि अगर आपको मेरी लेखिनी पसंद आई तो मुझे लिखना ना भूलें, और साथ ही भाभियों और आंटियों से अनुरोध है कि अगर उनको मेरी इस कहानी में कहीं भी अपनी कोई छाप मिलती है तो अपने विचार मुझे ईमेल ज़रूर करें. अगर मुझसे कुछ बातें करके अपना अनुभव बांटना चाहती हैं तो मुझे लिखना न भूलें। मुझे आपके पत्रों का इंतजार रहेगा। इसी के साथ आप सभी का सहृदय धन्यवाद। [email protected]

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